संस्कृत-शब्दकोशः

यवीयस् यशस्य

यशस्

यशस् (नपुं०) [अश् स्तुतौ असुन् धातो: युट च्]


प्रसिद्धि, ख्याति, कीर्ति, विश्रुति – विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि–मनु० ७।३४, यशस्तु रक्ष्यं परतो यशोधनैः–रघु० ३।४८, २।४० ।
समस्त पद
~कर
(वि०) (यशस्कर) कीर्ति देने वाला. यशस्वी –मनु० ८।३८७,
~काम
(वि०) (यशस्काम)
1 प्रसिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक
2. उच्चाकांक्षी, महत्त्वाकांक्षी,
~कायम्, ~शरीरम्
प्रसिद्धि के रूप में शरीर, कीर्तिदेह,–यशः शरीरे भव मे दयालु: –रघु० २।५७, रघु० १।५७, भर्तृ० २।३४,
~द
(वि०) (यशोद) कीर्तिकर
(–दः)
पारा
(–दा)
नन्द की पत्नी और कृष्ण की पालक माता का नाम,
~धन
(वि०), (वि०) कीर्ति ही जिसका धन है; ख्याति में समृद्ध, अत्यंत विश्रुत –अपि स्वदेहात् किमुतेन्द्रियार्थात् यशोधनानां हि यशो गरीयः –रघु० १४।३५, २।१,
~पटहः
यशरूपी ढोल,
~शेष
(वि०) जिसकी केवल ख्याति शेष हो, सिवाय कीर्ति के जिसका और कुछ न बचा हो, अर्थात् मृतव्यक्ति, तु० कीर्तिशेष,
(–षः)
मृत्यु ।


यशस् (नपुं०) [अश् स्तुतौ असुन् धातोः ल्युट् च]


1. कीर्ति ख्याति, प्रसिद्ध
2. पूज्य व्यक्ति
3. प्रसाद
4. धन
5. आहार
6. जल
7. विरल गुणों का एकत्र संग्रह
8. परोक्ष कीर्ति–छा० उ० ३।१८।३ ।
समस्त पद
~धा
कीर्ति प्रदान करने वाला ।

परिशिष्ट



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