रुच् (भ्वा० आ० रोचते, रुचित)
1. चमकना, सुन्दर या शानदार दिखलाई देना, जगमगाना–रुरुचिरे रुचिरेक्षणविभ्रमाः–शि० ६।४६, मनु० ३।६२
2. पसन्द करना, (अन्य व्यक्तियों से ) प्रसन्न होना, (वस्तुओं से) प्रसन्न होना, रुचिकर होना; (प्रसन्न व्यक्ति के लिए संप्र० तथा वस्तु के लिए कर्तृ०)–न स्रजो रुरुचिरे रमणीभ्यः–कि० ९।३५, यदेव रोचते यस्मै भवेत् तत् तस्य सुन्दरम् – हि० २।५३, कई बार व्यक्ति के लिए संबं०,–दारिद्रयान्मरणाद्वा मरणं मम रोचते न दारिद्र्यम्–मृच्छ० १।११,प्रेर०–(रोचयति-ते) पसन्द कराना, रुचिकर या सुहावना करना–कु० ३।१६,–इच्छा० (रुरु–रोचिषते) पसन्द करने की इच्छा करना,
अभि–
पसन्द करना, रुचिकर होना –यदभिरोचते भवते–विक्रम २,
प्र–
1. बहुत चमकना
2. पसन्द किया जाना, वि० चमकना, जगमगाना–रघु० ६।५, १७।१४, भट्टि० ८।६६ ।
रुच् (स्त्री०) [रुच्+क्विप्]
1. प्रकाश, कान्ति, उज्ज्वलता,–क्षणदासु यत्र च रुचैकतां गताः –शि० १३।५३ ९।२३, २५, शिखरमणिरुचः –कि० ५।४३, मेघ० ४४
2. रङ्ग, छबि (समास के अन्त में) चलयन्मृगरुचस्तालकान्–रघु० ८।५३, कु० ३।६५, कि० ५।४५
3. अभिरुचि, इच्छा ।