संस्कृत-शब्दकोशः

रोमक रोमन्थ

रोमन्

रोमन् (नपुं०) [रु+मनिन्]


मनुष्य और अन्य जीव जंतुओं के शरीर पर होने वाले बाल, विशेषतः, छोटे–छोटे बाल, कड़े बाल–मनु० ४।१४४, ८।११६ ।
समस्त पद
~अङ्क:
बाल का चिह्न,–बिभ्रती श्वेतरोमाङ्कम् –रघु० १।८३,
~अञ्चः
(हर्षातिरेक, बिभीषिका या आश्चर्य आदि में) पुलक, रोंगटे खड़े होना–हर्षाद्भुतभयादिभ्यो रोमाञ्चो रोमविक्रिया –सा० द० १६७, –
~अञ्चित
(वि०) हर्ष के कारण पुलकित,
~अन्तः
हथेली की पीठ पर के बाल,
~आली, ~आवलिः, –ली
(स्त्री०) रोमों की पंक्ति जो पेट पर ठीक नाभि के ऊपर को गई हो–शिखा धूमस्येयं परिणमति रोमावलिवपु:–काव्य० १०, दे० 'रोमराजि' भी,
~उद्गमः, ~उद्भेदः
(शरीर पर) बालों का खड़ा होना, पुलक, रोमांच–कु० ७।७७,
~कूपः, –पम्, ~गर्तः
चमड़ी के ऊपर के छिद्र जिनमें रोम उगे हों, लोमछिद्र,
~केशरम्, ~केसरम्
मुरछल, चंवर,
~पुलकः
रोंगटे खड़े होना, हर्षातिरेक–चौर० ३४,
~भूमिः
'बालों का स्थान' अर्थात् खाल, चमड़ी,
~रन्ध्रम्
रोमकूप,
~राजिः, –जी, ~लता
(स्त्री०) पेट पर ठीक नाभि के ऊपर रोमावली–रराज तन्वी नवरो (लो)मराजिः–कु० १।३८, शि० ९।२२,
~विकारः, ~विक्रिया, ~विभेदः
पुलक, रोमांच,–कि० ९।४६, कु० ५।१०,
~हर्षः
बालों या रोंगटों का खड़े होना, पुलक – वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते–भग० १।२९,
~हर्षण
(वि०) पुलक या रोमांच करने वाला, रोंगटे खड़े कर देने वाला, विस्मयोत्पादक–एतानि खलु सर्वभूतरो (लो)महर्षणानि – उत्तर० २, संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्–भग० १८।७४
(–णः)
सूत का नामान्तर, व्यास का एक शिष्य जिसने शौनकमुनि को कई पुराण सुनाये थे,
(–णम्)
शरीर पर रोंगटे खड़े होना, पुलक ।


रोमन् (नपुं०) रु+मनिन्]


1. शरीर के बाल
2. पक्षियों के पंख
3. मछलियों की त्वचा ।
समस्त पद
~सूची
बालों में लगाने की सूई ।

परिशिष्ट



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