वर (वि०) [वृ कर्मणि अप्]
1. श्रेष्ठ, उत्तम, सुन्दरतम या अत्यंत मूल्यवान्, छांटा हुआ, बढ़िया (संबं० या अधि० के साथ अथवा समास के अन्त में) –वदतां वरः– रघु० १।५९, वेदविदां वरेण –५।२३, ११।५४, कु० ६।१८, नृवरः, तरुवराः, सरिद्वराः आदि
2. अपेक्षाकृत अच्छा, दूसरे से अच्छा, ग्रंथिभ्यो धारिणो वराः –मनु० १२।१०३, –याज्ञ० १।३५१,
~रः
1. चुनने और छाँटने की क्रिया
2. छाँट, चुनाव
3. बरदान, आशीर्वाद, अनुग्रह, ‘वरं वृ या याच्’ वर मांगना, प्रीतास्मि ते पुत्र वरं वृणीष्व –रघु० २।६३, भवल्लब्धवरोदीर्ण –कु० २।३२, ('वर' और आशिस् का अन्तर जानने के लिए दे० आशिस्')
4. भेंट, उपहार, पारितोषिक पुरस्कार
5. कामना, इच्छा
6. याचना, अनुरोध.7. दूल्हा पति –वरं वरयते कन्या, दे० वधू (२) के नीचे भी
8. पाणिग्रहणार्थी विवाहार्थी
9. स्त्रीधन, दहेज
10. जामाता
11. कामुक, कामासक्त
12. चिडिया,
~रम्
जाफरान, केसर (वरम् को पृथक् देखिये) ।
समस्त पद
~अंग
(वि०) उत्तम रूप वाला
(–गः)
हाथी
(–गी)
हल्दी,
(–गम्)
1. सिर
2. उत्तम भाग
3. प्रांजल रूप
4. योनि,
5. हरी दारचीनी,
~अंगना
कमनीय स्त्री
~अर्ह
(वि०) वर पाने के योग्य,
~आजीवन
(पुं०) ज्योतिषी,
~आरोह
(वि०) सुन्दर कूल्हों वाला
(–हः)
उत्तम सवार
(–हा)
सुन्दर स्त्री,
~आलिः
चाँद,
~आसनम्
1. उत्तम चौकी
2. मुख्य आसन, सम्मान की कुर्सी
3. चीनी गुलाब,
~उरुः, –रू:
(स्त्री०) सुन्दर स्त्री (शा० सुन्दर जंघाओं से युक्त स्त्री),
~क्रतुः
इन्द्र का विशेषण,
~चन्दनम्
1. एक प्रकार की चन्दन की लकड़ी
2. देवदारु, चीड़ का पेड़,
~तनु
(वि०) सुन्दर अवयवों वाला
(स्त्री० –नुः)
सुन्दर स्त्री –वरतनुरथवासौ नैव दृष्टा त्वया मे –विक्रम० ४।२२,
~तंतुः
एक प्राचीन मुनि का नाम –रघु० ५।१,
~त्वचः
नीम का पेड़
~द
(वि०)
1. वर देने वाला, वरदान प्रदान करने वाला
2. मंगलप्रद
(–दः)
1. उपकारी
2. पितृवर्ग
(–दा)
1. नदी का नाम – मालवि० ५।१
2. कुमारी, कन्या,
~दक्षिणा
दुलहिन के पिताद्वारा दूल्हे को दिया गया उपहार,
~दानम्
वर प्रदान करना
~द्रुमः
अगर का वृक्ष,
~निश्चयः
दूल्हे का चुनाव,
~पक्षः
(विवाह में) दूल्हे के दल के लोग –रघु० ६।८६,
~प्रस्थानम्, ~यात्रा
विवाह संस्कार के लिए दूल्हे का जलूस के रूप में दुलहिन के घर की ओर कूच करना,
~फलः
नारियल का पेड़,
~बाह्लिकम्
जाफरान, केसर,
~युवतिः, –ती
(स्त्री०) सुन्दर तरुणी स्त्री,
~रुचिः
एक कवि और वैयाकरण का नाम (विक्रमादित्य राजा के दरबार के नवरत्नों में से एक, दे० नवरत्न; कुछ लोग पाणिनि के सूत्रों पर प्रसिद्ध वार्तिककार कात्यायन से इसकी अभिन्नता सिद्ध करते हैं),
~लब्ध
(वि०) जिसने वरदान प्राप्त कर लिया है
(–ब्धः)
चम्पक वृक्ष,
~वत्सला
सास, श्वश्रू,
~वर्णम्
सोना,
~वणिनी
1. उत्तम और सुन्दर रंगरूप वाली स्त्री
2. स्त्री
3. हल्दी
4. लाख
5. लक्ष्मी का नामांतर
6. दुर्गा का नामांतर
7. सरस्वती का नाम
8. 'प्रियंगु' नाम की लता,
~स्रज्
'दूल्हे की माला' वह माला जो दुलहिन, दूल्हे के गले में डालती है ।
वरम् (अव्य) [वृ+अप्]
अपेक्षाकृत, श्रेष्ठतर, श्रेयस्कर, अधिक अच्छा, कभी कभी यह अपा० के साथ प्रयुक्त होता है –समुन्नयन् भूतिमनार्यसंगमाद्वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः–कि० ४।८, परन्तु इस शब्द का प्रयोग बहुधा बिना किसी शर्त के होता है; ‘वरम्’ प्रायः उस वाक्य खंड के साथ प्रयुक्त होता है जिसमें अपेक्षित वस्तु विद्यमान है; तथा 'न च' 'न तु' और 'न पुनः' उस वाक्यखंड के साथ जिनमें वह वस्तु विद्यमान है जिसकी अपेक्षा पूर्ववर्ती को प्रमुखता दी गई है । (दोनों कर्तृ० में रक्खे जाते हैं), वरं मौनं कार्य न च वचनमुक्तं यदनृतं......वरं भिक्षाशित्वं न च परधनास्वादनसुखम् –हि० १, वरं प्राणत्यागो न पनरधमानामुपगमः–तदेव०, कभी कभी ‘न’ का प्रयोग 'च, तु, और पुनः' के बिना भी होता है –याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा –मेघ० ६ ।
वर (वि०) [वृ+अप्]
उत्तम, श्रेष्ठ, बढिया, अनमोल,
~रः
1. वरदान
2. उपहार, पारितोषिक
3. इच्छा
4. प्रार्थना
5. दान
6. दूल्हा
7. जामाता ।
समस्त पद
~अरणिः
माता –रा० ७।२३।२२,
~आरुहः
बैल,
~इन्द्री
पुराना गौड देश,
~प्रेषणम्
विवाह संस्कार का एक भाग जिसके अनुसार दुल्हे के मित्र किसी विशेष परिवार में दुलहन की खोज के लिए जाते हैं
~पुरुषाः
श्रेष्ठजन,
~लक्षणम्
विवाह में संस्कारकी बातें ।
परिशिष्ट