शक्य (सं० कृ०) [शक्+यत्]
1. संभव, क्रियात्मक, किये जाने के योग्य, (प्रायः तुमुन्नंत के साथ) –शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् –भर्तृ० २।११, रघु० २।४९, ५४
2. कार्यान्वयन के योग्य
3. कार्यान्वयन में सरल
4. प्रत्यक्ष कहा गया, अभिहित (शब्दार्थ आदि) –शक्योऽर्थोऽभिधया ज्ञेयः –सा० द० ११
5. संभाव्य (कभी–कभी शक्यम्' शब्द कर्मवा० में तुमुन्नन्त के साथ विधेय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, उस समय तुमुन्नंत का वास्तविक अभिप्राय कर्तृ० में होता है –एवं हि प्रणयवती सा शक्यमुपेक्षितुं कुपिता –मालवि० ३।२२, शक्यं...अविरलमालिङ्गितुं पवनः –श० ३।६, विभूतयः शक्यमवाप्तमूर्जिताः –सुभा०, भग० १८।११ ।
समस्त पद
~अर्थः
प्रत्यक्ष अभिहितार्थ ।
शक्य (वि०) [शक्+ण्यत्]
श्रुतिमधुर–शक्यः प्रियंवदःप्रोक्तः इति हलायुधः –दश० २ ।५।
परिशिष्ट