संस्कृत-शब्दकोशः

यतर यति

यतस्

यतस् (अव्य०) [यद्+तसिल्]


(बहुधा संबंधबोधक सर्वनाम 'यद्' के अपा० के रूप में प्रयुक्त) १. जहां से (व्यक्ति या वस्तु का उल्लेख करते हुए) जिस जगह से, जिस स्थान से या जिस दिशा से –यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तम् –रघु० ५।४ (यतः –यस्मात् जिस से)–यतश्च भयमाशङ्केत्प्राचीं तां कल्पयेद्दिशम् –मनु० ७।१८९
2. जिस कारण, जिस लिए
3. क्योंकि, चूँकि, के कारण से, इस लिए कि –उवाच चैनं परमार्थतो हरं न वेत्सि नूनं यत एवमात्थ माम् –कु० ५।७५, रघु० ८।७६, प्रायः सहवर्ती ‘ततः’ के साथ; रघु० १६।७४
4. जिस समय से लेकर जब से कि
5. ताकि, जिससे कि (‘यतस्ततः’
1. जिस किसी जगह से, किसी भी दिशा से
2. चाहे किसी व्यक्ति से
3. चाहे जहां, चारों ओर, किसी भी दिशा में, मनु० ४।१५, ‘यतो यत:’
1. चाहे जिस जगह से
2. चाहे जिस मे. किसी भी व्यक्ति से
3. चाहे जहां, चाहे जिस दिशा में –यतोयतः षट्चरणोऽभिवर्तते –श० १।२४, भग० ६।२६; ‘यतः प्रभृति’ जिस समय से लेकर) ।
समस्त पद
~भव
(वि०) जिससे उत्पन्न,
~मूल
(वि०) जिसमें जन्म लेने वाला, या जिससे उदित ।



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