यावत् (वि०) (स्त्री० –‘ती’) [यद्+वतुप्, आत्वम्]
('तावत्' का सहसंबंधी)
1. जितना, जितने ('जितने' के लिए यावत् तथा 'उतने' के लिए तावत् का प्रयोग होता है)–
“पुरे तावन्तमेवास्य तनोति रविरातपम् ।
दीर्घिकाकमलोन्मेषो यावन्मात्रेण साध्यते ॥”
–कु० २।३३, ते तु यावन्त एवाजौ तावांश्च ददृशे स तैः–रघु० १२।४५, १७।१७
2. जितना बड़ा, जितना विस्तृत, कितना बड़ा या कितना विस्तृत–
“यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥”
–भग० २।४६, १८।५५
3. सब, समस्त (यहाँ दोनों मिल कर समष्टि या साकल्य का अर्थ प्रकट करते हैं) –यावद्दत्तं तावद्भक्तम् – गण० अव्य०, 'यावत्' अकेला प्रयुक्त होकर निम्नांकित अर्थ प्रकट करता है
(क) जहां तक, तक, पर्यन्त, जब तक कि, (कर्म० के साथ)–स्तन्यत्यागं यावत् पुत्रयोरवेक्षस्व–उत्तर० ७, कियन्तमवधिं यावदस्मच्चरितं चित्रकारेणालिखितम् –उत्तर० १, सर्पकोटरं यावत्– पंच० १
(ख) तभी, ठीक उसी समय, इसी बीच में (तुरन्त किये जाने वाले कार्य को दर्शाने वाला), तद्