रक्षा [रक्ष्–भावे अ+टाप्]
1. वचाव, संधारण, चौकसी –मयि सृष्टिर्हि लोकानां रक्षा युष्मा स्ववस्थिता –कु० २।२८, शि० १८।३१, श० १।१४, रघु० २।४, मेघ० ४३
2. देखभाल, सुरक्षा
3. चौकसी, पहरा
4. ताबीज या गण्डा, परिरक्षी, जैसे कि नीचे 'रक्षाकरण्ड में
5. अभिभावक देवता
6. भस्म, राख
7. रक्षावन्धन, पहुँची (विशेषकर श्रावण पूर्णिमा के दिन कलाई में बांधी जाने वाली रेशम या सूत की डोरी) ताबीज या गण्डे के रूप में (इस अर्थ में 'रक्षी' शब्द भी प्रयुक्त है) ।
समस्त पद
~अधिकृतः
जिसे प्ररक्षण या अधीक्षण कार्य सुपुर्द किया गया है, अधीक्षक या शासक अथवा राज्यपाल
2. दण्डनायक, मजिस्ट्रेट
3. मुख्य आरक्षाधिकारी
~अपेक्षकः
1. कुली, द्वारपाल
2. अन्तःपुर का पहरेदार
3. गांडू, लौंडा
4. नाटक का पात्र अभिनेता,
~करण्ड:, ~करण्डकम्
तबीज की डिबिया, गण्ड, जादू की डिबिया–अहो रक्षाकरण्डकमस्य मणिवन्धे न दृश्यते –श० ७,
~गृहम्
प्रसूति का गृह,–रक्षांगृहगता दीपा: प्रत्यादिष्टा इवाभवन् –रघु० १०।५९,
~पात्रः
एक प्रकार का भोजपत्र,
~पाल:, ~पुरुषः
पहरेदार, चौकीदार, प्रारक्षी,
~प्रदीपः
वह दीपक जो भूत प्रेत से बचाव के लिए जलता हुआ रखा जाता है,
~भूषणम्, ~मणि, ~रत्नम्
एक प्रकार का आभूषण जो ताबीज की भांति भूत प्रेतादि की बाधा से बचाव के लिए पहना जाता है ।
रक्षा [रक्ष्+अ+टाप्]
1. बचाना, रखना
2. सावधानी, सुरक्षा
3. चौकीदारी
4. रक्षा ताबीज
5. भस्म
6, रक्षाबन्धन, पहुँची
7. लाख ।
समस्त पद
~प्रतिसरः
कलाई पर ताबीज की भाँति बाँधी जाने वाली पहुँची, रक्षाबन्धन,
~महौषधिः
रक्षा करने की श्रेष्ठतम औषधि ।
परिशिष्ट