रजस् (पुं०) [रञ्ज्+असुन्, नलोपः]
1. धूल, रेणु, गर्द –धन्यास्तदङ्गरजसा मलिनीभवन्ति –श० ७।१७, आत्मोद्धतैरपि रजोभिरलंघनीयाः –१।८, रघु० १।४२, ६।३२
2. फूल की रेणु या पराग – भूयात्कृशेशयरजोमृदुरेणुरस्याः (पंथाः)–श० ४।१०, मेघ० ३३,६५
3. सूर्य किरणों में फैले हुए कण, कोई भी छोटा सा कण – तु० मनु० ८।१३२, याज्ञ० १।३६२
4. जुती हुई भूमि, कृषियोग्य खेत
5. अन्धकार, अन्धेरा
6. मलिनता, आवेश, संवेग, नैतिक या मानसिक अन्धकार–अपथे पदमर्पयन्ति हि श्रुतवन्तोऽपिरजोनिमीलिताः –रघु० ९।७४
7. सब प्रकार के भौतिक द्रव्यों के घटक गुणों अथवा तीन गुणों में से दूसरा –( दूसरे दो गुण हैं सत्त्व और तमस्, जीवजन्तुओं में बड़ी भारी क्रियाशीलता का कारण 'रजस्' समझा जाता है, यह गुण मनुष्यों में बहुतायत से पाया जाता है जैसे कि देवताओं में सत्त्व तथा राक्षसों में तमस् पाया जाता है), अन्तर्गतमपास्तं में रजसोऽपि परं तमः –कु० ६।६९, भग० ६।२७, मा० १।२०
8. रजःस्राव, ऋतुस्राव –मनु० ४।४१, ५।६६ ।
समस्त पद
~गुणः
दे० (7) ऊपर,
~तमस्क
(वि०) रज और तम दोनों गुणों से प्रभावित,
~तोकः, –कम्, ~पुत्रः
1. लोलुपता, लालच
2. 'जोश का पुतला' यह प्रकट करने के लिए कि यह व्यक्ति तुच्छ है, नगण्य है, इस शब्द का प्रयोग किया जाता है,
~दर्शनम्
प्रथम बार रजोधर्म का होना, सबसे पहला रजःस्राव,
~बन्धः
रजोधर्म का बन्द हो जाना,
~रसः
अन्धेरा,
~शुद्धिः
रजोधर्म की विशुद्ध दशा,
~हरः
'मैल हटाने वाला' धोबी ।
रजस् (नपुं०) [रञ्ज्+असुन्, नलोप:]
1. धूल, गर्दा
2. पुष्प की धूल, पराग
3. अन्धेरा
4. आवेश, नैतिक अन्धकार
5. तीनों गुणों में दूसरा
6. भाप
7. बादल या वर्षा का पानी
8. पाप– प्रायश्चित्तं च कुर्वन्ति तेन तच्छाम्यते रजः–रा० ४।८।३४ ।
समस्त पद
~जुष्
(वि०) रजोगुण से युक्त,
~मेघः
धूल का बादल,
~विधूम्र
(वि०) धूल से भूरे रङ्ग का हुआ–युधि तुरगरजो विधूम्रविष्वक् भाग० १।९।३४ ।
परिशिष्ट