राज् (पुं०) [राज्+क्विप्]
राजा, सरदार, युवराज ।
राज् (भ्वा० उभ० राजति–ते, राजित)
1.
(क) चमकना, जगमगाना, शानदार या सुन्दर प्रतीत होना, प्रमुख होना–रेजे ग्रहमयीव सा–भर्तृ० १।१७, राजन् राजति वीरवैरिवनिता वैधव्यदस्ते भुजः–काव्य० १०, रघु० ३।७, कि० ४।२४, ११।६
(ख) प्रतीत होना, झलक दिखाई देना,–तोयान्तर्भास्करावलीव रेजे मुनिपरम्परा –कु० ६।४९
2. हकूमत करना, शासन करना–प्रेर० (राजयति–ते) चमकाना, रोशनी करना, उज्ज्वल करना ।
निस्–
प्रेर० चमकाना, रोशनी करना, उज्ज्वल करना, अलंकृत करना, देदीप्यमान करना–दिव्यास्त्रस्फुरदुग्रदीधितिशिखानीराजितज्यं धनु:– उत्तर० ६।१८, नीराजयन्ति भूपालाः पादपीठान्तभूतलम्–प्रबो० २
2. आरती उतारना, नीराजन करना (पूजा या सम्मान की दृष्टि के कारण जलते हुए दीपकों के थाल को घुमाना) –नानायोधसमाकीर्णो नीराजितहयद्विपः–काम० ४।६६
वि–
1. चमकाना, भामि० १।८८
2. दिखाई देना, प्रतीत होना – रघु० २।२० ।