संस्कृत-शब्दकोशः

रुहा रूक्ष

रुह्

रुह् (भ्वा० पर० रोहति, रूढ)
1. उगना, फूटना, अंकुरित होना, उपजना–रूढरागप्रवाल:–मालवि० ४।१, केसरैरर्धरूढैः–मेघ० २३, छिन्नोऽपि रोहति तरुः –भर्तृ० २।८७
2: उपजना, विकसित होना, बढ़ना
3. उठना, ऊपर चढ़ना, उन्नत होना
4. पकना, (व्रण आदि को) स्वस्थ होना–प्रेर० (रोपयति–ते, रोहयति–ते)
1. उगाना, पौधा लगाना, भूमि में (बीज) बखेरना
2. उठाना, उन्नत करना
3. सौंपना, सुपुर्द करना, देखरेख में देना,–गुणवत्सुतरोपितश्रियः –रघु० ८।११
4. स्थिर करना, निदेशित करना, जमाना–रघु० ९।२२, इच्छा० (रुरुक्षति) उगाने की इच्छा करना,
अधि–
चढ़ना, सवार होना, सवारी करना – रघु० ७।३७, कु० ७।५२ (प्रेर०) उन्नत होना, ऊपर उठाना, बिठाना–रघु १९।४४,
अव–
नीचे जाना, उतरना – श० ७।८,
आ–
चढ़ना, सवार होना, पकड़ लेना, सवारी करना, (आ पूर्वक रुह् धातु के अर्थ प्रयुक्त संज्ञा के अनुसार विभिन्न प्रकार के होते हैं –उदा० ‘प्रतिज्ञाम् आरुह्’ वचन देना, प्रतिज्ञा करना, ‘तुलाम् आरुह्’ समानता के स्तर पर होना, ‘संशयं आरुह्’ जोखिम उठाना, सन्दिग्धावस्था में होना आदि), (प्रेर०)
1. उन्नत होना, उठाना
2. रखना, जमाना, निदेशित करना
3. मढ़ना, थोपना, आरोपित करना
4. (धनुष पर) प्रत्यंचा चढ़ाना
5. नियुक्त करना, कार्य भार सौंपना,
प्र–
उगना, अंकुरित होना–न पर्वताग्रे नलिनी प्ररोहति –मृच्छ० ४।१७,
वि–
उगना, अंकुर फूटना –रघु० २।२६, मृच्छ० १।९ (प्रेर०) (व्रण आदि का) स्वस्थ होना,
सम्–
उगना, रघु० ६।४७ ।


रुह् (वि०) (समास के अन्त में) [रुह्+क्विप्]


उगा हुआ या उत्पन्न, जैसा कि 'महीरुह्' और 'पङ्



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