वच् (अदा० पर०) (आर्धधातुक लकारों में आ० भी, कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि सार्वधातुक लकारों में, अन्यपुरुष बहुवचन के रूप सदोष होते हैं, तथा कुछ के अनुसार समस्त बहुवचन में वक्ति, उक्तम् )
1. कहना, बोलना –वैराग्यादिव वक्षि–काव्य० १०, (प्रायः दो कर्मों के साथ)–तामूचतुस्ते प्रियमप्यमिथ्या –रघु० १४।६, कभी कभी 'भाषण' अर्थ को बतलाने वाले शब्दों के साथ दूसरी विभक्ति में –उवाच धात्र्या प्रथमोदितं वचः –रघु० ३।५०,२।५९, क एवं वक्ष्यते वाक्यम् –रामा०
2. वर्णन करना. बयान करना – रघूणामन्वयं वक्ष्ये –रघु० १।९
3. कहना, समाचार देना, घोषणा करना, प्रकथन करना –उच्यतां मद्वचनात् सारथिः –श० २, मेघ० ९८
4. नाम लेना, पुकारना –तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते –मनु० १।७९, प्रेर०–(वाचयति ते)
1. बुलवाना
2. निगाह डालना, पढ़ना, अवलोकन करना
3. कहना, बोलना, प्रकथन करना
4. प्रतिज्ञा करना, इच्छा० (विवक्षति) बोलने की इच्छा करना, (कुछ) कहने का इरादा करना,
अनु–
बाद में कहना, आवृत्ति करना, पाठ करना, (प्रेर०) मन में पढ़ना –नाममुद्राक्षराण्यनुवाच्य– श० १,
निस्–
1. अर्थ करना, व्याख्या करना –वेदा निर्वक्तुमक्षमाः
2. वर्णन करना, बोलना, प्रकथन करना, घोषणा करना
3. नाम लेना, पुकारना,
प्रति–
उत्तर में बोलना, जबाब देना, प्रतिवाद करना –न चेद्रहस्यं प्रतिवक्तुमर्हसि –कु० ५।४२, रघु० ३।४८,
वि–
व्याख्या करना,
सम्–
कहना, बोलना ।