संस्कृत-शब्दकोशः

वह्लीक वाक

वा

वा (अव्य०) [वा+क्विप्]


1. विकल्प बोधक अव्यय, या, परंतु संस्कृत में इसकी स्थिति भिन्न है, या तो यह प्रत्येक शब्द या उक्ति के साथ प्रयुक्त होता है, अथवा अन्तिम के साथ, परन्तु यह वाक्य के आरंभ में कभी प्रयुक्त नहीं होता, तु० 'च'
2. इसके निम्नांकित अर्थ है
(क) और, भी,–वायुर्वा दहनो वा–गण०, अस्ति ते माता स्मरसि वा तातम् उत्तर० ४,
(ख) के समान, जैसा कि जातां मन्ये तुहिनमथितां पद्मिनीं वान्यरूपाम् मेघ० ८३, मणी वोष्ट्रस्य लंबेते –सिद्धा०, हृष्टो गर्जति चातिदर्पितबलो दुर्योधनो वा शिखी मृच्छ० ५।६, मालवि० ५।१२, शि० ३।६३, ४।३५, ७।६४, कि० ३।१३
(ग) विकल्प से–(इस अर्थ में बहुधा इसका प्रयोग व्याकरण के नियमों में –जैसा कि पाणिनि के सूत्र होता है) दोषो णौ वा चित्तविरागे –पा० ६।४।९०, ९१
(घ) संभावना (इस अर्थ में 'वा' वहुधा प्रश्नवाचक सर्वनाम और उससे व्युत्पन्न 'इव' 'नाम' जैसे शब्दों के साथ जोड़ दिया जाता है तथा 'संभवतः' या 'कदाचित' शब्दों से उसे अनदित किया जाता है –कस्य वान्यस्य वचसि मया स्थातव्यम् का०, परिवर्तिनि संसारे मृत: को वा न जायते–पंच० १।२७,
(ङ) कभी–कभी केवल पादपूर्ति के लिए ही प्रयुक्त होता है
3. जब 'वा' की पुनरुक्ति की जाती है तो इसका अर्थ होता है या–या–सा वा शंभोस्तदीया वा मूर्तिर्जलमयी मन–कु० २।६०, तदत्र परिश्रमानुरोधाद्वा उदात्तकथावस्तुगौरवाद्वा नवनाटकदर्शनकुतूहलाद्वा भवद्भिरवधानं दीयमानं प्रार्थये विक्रम० १, (‘अथवा’ या, कुछ-कुछ, अन्यथा ,–दे० 'अथ' के नीचे, ‘न वा’ नहीं, न तो, न, ‘यदि वा’ अगर, अन्यथा, ‘किं वा’ कि, क्या, आया कि आदि ।


वा (भ्वा० अदा० पर० वाति, वात या वान)
1. हवा का चलना –वाता वाता दिशि दिशि न वा सप्तधा सप्तभिन्ना–वेणी० ३।६, दिशः प्रसेदुर्मरुतो ववुः सुखाः –रघु० ३।१४, मेघ० ४२, भट्टि० ७१, ८।६१
2. जाना, हिलना–जुलना
3. प्रहार करना, चोट पहुंचाना, क्षतिग्रस्त करना–प्रेर० (वापयति–ते)
1. हवा चलवाना
2. वाजयति ते डुलना,
आ–
हवा का चलना–बद्धां बद्धां भित्तिशंकाममुष्मिन्नावानावान्मातरिश्वा निहन्ति–कि० ५।३६, भट्टि० १४।९७,
निस्–
1. खिलना
2. ठंडा होना, शान्त होना, (आलं० से भी) वपुर्जलापिवनैर्न निर्ववो –शि० १।६५, त्वयि दुष्ट एव तस्या निर्वाति मनो मनोभवज्वलिते सुभा०
3. फूंक मारना, बुझना, तिष्प्रभ होना–निर्वाणदीपे किमु तैल दानम्, निर्वाणभूयिष्ठमथास्य वीर्यं संधुक्षयंतीव वपुर्गुणेन –कु० ३।५२, शि० १४।८५, (प्रेर०)
1. फूंक मारना, बुझाना
2. शांत करना, गर्मी दूर करना, शीतल करना–रत्न० ३।११, रघु० १९।५६
3. रिझाना, सान्त्वना देना, आराम पहुँचाना –रघु० १२।६३,
प्र–, वि–
हवा का चलना–वायुर्विवाति हृदयानि हरन्नराणाम् –ऋतु० ६।२३



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