संस्कृत-शब्दकोशः

वाह्लीक विक

वि

वि (अव्य०) [वा+इण्, स च डित्]


1. धातु और संज्ञा शब्दों के पूर्व जुड़ कर इसका निम्नांकित अर्थ होता है:–(क) पृथक्करण, वियोजन (एक ओर, अलग–अलग, दूर, परे आदि) यथा वियुज्, विहृ, विचल् आदि
(ख) किसी कर्म का उलट, यथा ‘क्री’ खरीदना, ‘विक्री’ बेचना, ‘स्मृ’ याद करना ‘विस्मृ’ भूल जाना
(ग) प्रभाग यथा विभज्, विभाग
(घ) विशिष्टता–यथा विशिष् विशेष; विविच्, विवेक
(ङ) विभेदीकरण व्यवच्छेदः
(च) क्रम, व्यवस्था यथा विधा, विरच्
(छ) विरोध यथा विरुध्, विरोध; अभाव यथा विनी, विनयन
(ज) विचार, यथा विचर, विचार
(झ) तीब्रता–विध्वंस
2. संज्ञा या विशेषण शब्दों में (जो कि क्रिया से सटे हुए न हों) जुडकर 'वि' निम्नांकित अर्थ प्रकट करता है
(क) निषेध या अभाव (ऐसी अवस्था में इसका प्रयोग अधिकतर उसी प्रकार होता है जैसे कि 'अ' या 'निर्' का, अर्थात् इसके लगने पर बहुब्रीहि समास बनता है–विधवा, व्यसुः आदि
(ख) तीव्रता, महत्ता यथा विकराल
(ग) वैविध्य–यथा विचित्र
(घ) अन्तर–यथा विलक्षण
(ङ) बहुविधता–यथा विविध
(च) वैपरीत्य, विरोध यथा विलोम
(छ) परिवर्तन– यथा विकार
(ज) अनौचित्य –यथा विजन्मन् ।


विः (पुं० स्त्री०) [वा+इण्, स च डित्]


1. पक्षी
2. घोड़ा ।



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