वृथा (अव्य०) [वृ+थाल् किच्च]
1. बिना किसी अभिप्राय के, व्यर्थ, निरर्थक, बिना किसी लाभ के, (बहुधा विशेषण की शक्ति से युक्त) –व्यर्थं यत्र कपीन्द्रसख्यमपि मे बीर्यं हरीणां वृथा –उत्तर० ३।४५, दिवं यदि प्रार्थयसे वृथा श्रमः –कु० ५।४५
2. अनावश्यक रूप से
3. मूर्खता से, आलस्य पूर्वक, बेलगाम
4. गलत तरीके से, अनुचित रूप से (समास के आरम्भ में 'वृथा' शब्द का अनुबाद 'व्यर्थ, निरर्थक', अनुचित, मिथ्या या आलसी, किया जा सकती है ) ।
समस्त पद
~अट्या
अलसता के साथ टहलना, सामोद भ्रमण करना,
~आकारः
मिथ्या रूप, खाली तमाशा,
~कथा
बेहूदी बात,
~जन्मन्
(नपुं०) अलाभकर या व्यर्थ जन्म,
~दानम्
वह उपहार जो प्रतिज्ञात होने पर भी न दिया गया हो,
~मति
(वि०) दुर्बुद्धि, मूर्ख,
~मांसम्
वह मांस जो देवताओं या पितरों के लिए अभिप्रेत न हो,
~वादिन्
(वि०) मिथ्या भाषी,
~श्रमः
व्यर्थ चेष्टा या कष्ट उठाना ।