संस्कृत-शब्दकोशः

वृधसानु वृन्त

वृध्

वृध्
i (भ्वा० आ०–परन्तु लृट्, लुट्, लुङ्, लृङ् और सन्नन्त में पर०, वर्धते, वृद्ध, इच्छा० विवृत्सति या विवर्धिषते)
1. विकसित होना, बढ़ना, विस्तृत होना, मजबूत या बलवान् होना, फलना, समृद्ध होना –अन्योन्यजनसंरम्भो ववृधे वादिनोरिव –रघु० १२।९२, १०।७८, धनक्षये वर्धति जाठराग्निः –सुभा०, भट्टि० १४।१३, १९।२६
2. जारी रखना, टिकाऊ रहना
3. उठना, चढ़ना
4. बधाई का कारण होना –(प्रायः 'दिष्ट्या' के साथ) दिष्ट्या धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदर्शनेन चायुष्मान् वर्धते –श० ७,
“धर्मपत्नी के मिलने के उपलक्ष्य में आपको बधाई हो”, प्रेर० (वर्धयति-ते, वर्धापयति-ते भी)
1. विकसित कराना, बढ़ाना, वृद्धियुक्त करना, ऊँचा उठाना, ऊँचा करना, उन्नत करना –वर्धयन्निव तत्कूटानुद्धूतैर्धातुरेणुभिः –रघु० ४।७१
2. समृद्ध कराना, यशस्वी बनाना, विस्तीर्ण करना, बड़ाई करना हि० ३।३
3. बाधाई देना, अभिनन्दन करना (इस अर्थ में ‘वर्धापयति’)
अभि–
विकसित होना बढ़ना –क्षीणः क्षीणोऽपि शशी भूयो भूयोऽभिवर्धते नित्यम् –काव्य० १०,
परि–,
प्र–, वि–
, विकसित होना, बढ़ना, समृद्ध होना,
सम्–
बढ़ना, –रघु० ५।६ ।
ii (चुरा० उभ० वर्धयति-ते)
1. बोलना, चमकना ।



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