शप् (भ्वा०, दिवा० उभ० शपति-ते, शप्यति-ते, शप्त)
1. अभिशाप देना, कोसना अशपद्भव मानुषीति ताम्–रघु० ८।८०, सोऽभूत् परासुरथ भूमिपतिं शशाप (वृद्धः) ९।७८, १।७७
2. शपथ लेना, कसम उठाना, शपथपूर्वक प्रतिज्ञा करना, सौगंध खाना (प्रायः प्रतिज्ञात मे संप्र० तथा प्रतिज्ञाता के लिए करण० प्रयुक्त होता है)–
“भरतेनात्मना चाह शपे ते मनुजाधिप ।
यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात् ॥”
–राम०, कर्मरहित प्रयोग होने पर शपथवस्तु में करण० तथा जिसके द्वारा शपथ की जाय उशमें संप्र० प्रयुक्त होता है –सत्यं शपामि ते पादपंकजस्पर्शेन–का०, घट० २२, अशप्त निह्नवानोसौ सीतायै स्मरमोहितः –भट्टि० ८।७४, ३३, कभी कभी 'शप्' का सजातीय कर्म के अनुसार प्रयोग होता है –सहस्रशोऽसौ शपथानशप्यत्–भट्टि० ३।३२
3. कलंकित करना, धमकाना, बुरा-भला कहना, गाली देना (संप्र० के साथ या स्वतंत्ररूप से)–द्विषद्भ्यश्चाशपंस्तथा – भट्टि० १७।४, प्रतिवाचमदत्त केशवः शपमानाय न चेदिभूभुजे –शि० ४।२५, – प्रेर० (शापयति-ते) शपथद्वारा बाँध लेना, शपथपूर्वक प्रतिज्ञा करना–शापितोऽसि गोब्राह्मणकाम्यया –मृच्छ० ३, मा०८।