शिष्
i (भ्वा० पर०, शेषति) चोट पहुँचाना, मार डालना ।
ii (भ्वा० पर०, चुरा० उभ० शेषति, शेषयति-ते) अवशिष्ट छोड़ देना, बचा देना ।
iii (रुधा० पर० शिनष्टि, शिष्ट)
1. बाक़ी छोड़ना, बचा रखना, अवशिष्ट छोड़ना
2. दूसरों से भिन्नता करना–प्रेर० (शेषयति-ते) छोड़ना,
अव–
बाकी छोड़ना, पीछे छोड़ना (प्रायः कर्मवा० में) –स्तम्बेन नीवार इवावशिष्ट:–रघु० ५।१५, कियदवशिष्टं रजन्याः –श० ४, निद्रागमसीम्नः कियदवशिष्टम् – महावी० ६, भग० ७।२,
उद्–
बाक़ी छोड़ना –दे० 'उच्छिष्ट',
परि–
अवशिष्ट छोड़ना (प्रेर० भी) – भविता करेणपरिशेषिता मही–भामि० १।५३,
वि–
1. विशिष्ट करना, विशेषता देना, विशेष रूप से कहना, परिभाषा करना
2. भेद करना, विवेचन करना
3. बढ़ाना, ऊँचा करना, वृद्धि करना, गहरा करना –पुनरकाण्डविवर्तनदारुणो विधिरहो विशिनष्टि मनोरुजम्–मा० ४।४, उत्तर० ४।१५ (कर्मवा०)
1. भिन्न होना–रघु० १७।६२
2. अपेक्षाकृत अच्छा या ऊँचे दर्जे का होना, आगे बढ़ जाना, श्रेष्ठ होना, (अपा० के साथ) अपेक्षाकृत बढ़िया और दूसरों से अच्छा होना –मनु० २।८३, ३।२०३, (प्रेर०) आगे बढ़ जाना श्रेष्ठ होना–मृच्छ० ४।४, मालवि० ३।५ ।