मृषा (अव्य०) [मृष्+का]
मिथ्या, गलती से, असत्यता के साथ, झूठमूठ–यद्वक्त्रं मुहुरीक्षसे न धनिनां ब्रूषे न चाटुं मृषा–भर्तृ० ३।१४७, मृषाभाषासिन्धो–भामि० २।२४
2. व्यर्थ, निष्प्रयोजन, निरर्थक ।
समस्त पद
~अध्यायिन्
(पुं०) एक प्रकार का सारस,
~अर्थक
(वि०)
1. असत्य
2. बेहूदा
(–कम्)
असंगति, असंभावना,
~उद्यम्
मिथ्यात्व, झूठ, झूठी उक्ति –तत्किं मन्यसे राजपत्रि मृषोद्यं तदिति– उत्तर० ४,
~ज्ञानम्
अज्ञान, अशुद्धि, भूल,
~भाषिन्, ~वादिन्
(पुं०) झूठा, झूठ बोलने वाला,
~वाच्
(स्त्री०) असत्योक्ति, व्यङ्ग्योक्ति, व्यंग्यकाव्य, ताना,
~वादः
1. असत्योक्ति, झूठ, मिथ्या
2. कपटपूर्ण उक्ति, चापलूसी
3. व्यंग्य, व्यंग्योक्ति ।