यत्र (अव्य०) [यद्+त्रल्]
1. जहाँ, जिस स्थान में, जिधर –सैव सा (द्यौः) चलति यत्र हि चित्तम् – नै० ५।५७, कु० १।७, १०
2. जब, जैसा कि 'यत्र काले' में
3. चूँकि क्योंकि, जब से, जहाँ (‘यत्रयत्र’ जहाँ कहीं–यत्र यत्र धुमस्तत्र तत्र वह्निः –तर्क० ‘यत्र यत्र’ चाहे जिस स्थान में, सर्वत्र, ‘यत्रकुत्र, यत्रक्वचन, –क्वापि’
1. जहाँ कहीं, चाहे जिस जगह
2. जब कभी ।