संस्कृत-शब्दकोशः

यदृच्छातस् यद्वद

यद्

यद् (सर्व० वि०) [यज्+अदि, डित्]


(कर्तृ०, ए० व०, पुं० यः, स्त्री० या, नपुं० यत्–द्) संबंधबोधक सर्वनाम जो जौन सा, जो कुछ
(क) इसका उपयुक्त सहसंबंधी 'तद्' है,–यस्य बुद्धिर्बलं तस्य, परन्तु कभीकभी 'तद्' के स्थान पर इदम्, अदस् या एतद् को भी प्रयुक्त किया जाता है, कभी कभी 'यद्' शब्द अकेला ही प्रयुक्त होता है, तथा उसके सहसंबंधी सर्वनाम का ज्ञान प्रकरण से ही कर लिया जाता है, दोनों संबंधबोधक सर्वनाम बहुधा एक ही वाक्य में प्रयुक्त किये जाते हैं –यदेव रोचते यस्मै भवेत्तत्तस्य सुन्दरम्
(ख) जब इस शब्द की आवृत्ति कर दी जाती है तो इसका अर्थ होता है 'समष्टि' तथा इस शब्द का अनुवाद होता है जो कोई' 'जो कुछ'; इस अवस्था में सहसंबंधी सर्वनाम 'तद्' की भी आवृत्ति की जाती है–यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुबल: पाण्डवीनां चमूनाम् .. क्रोधान्धस्तस्य तस्य स्वयमिह जगतामन्तकस्यान्तकोऽहम् –वेणी० ३।३०
(ग) जब 'यद्' को किसी प्रश्नवाचक सर्वनाम या उससे व्युत्पन्न किसी और शब्द के साथ जोड़ दिया जाता है, साथ में निपात 'चिद् चन, वा या अपि' लगे हों या न लगे हों, तो इसका अर्थ होता है 'कुछ भी' 'चाहे जो कोई' 'कोई'; ‘येन केन प्रकारेण’ जिस किसी प्रकार से, किसी न किसी प्रकार से; यत्र कुत्रापि, यो वा को वा, यः कश्चन आदि; ‘यत्किंचिदेतद्’ 'यह तो केवल तुच्छ बात है । यानि कानि च मित्राणि–आदि, (अव्य०) अव्यय के रूप में 'यद्' नाना प्रकार से प्रयुक्त होता है
1. किसी प्रत्यक्ष या आश्रित वाक्य को आरम्भ करने में अन्त में चाहे 'इति' हो या न हो–सत्योऽयं जनप्रवादो यत्संपत्संपदमनुबध्नातीति–का० ७३,–तस्य कदाचिच्चिन्ता समुत्पन्ना यदर्थोत्पत्त्युपायाश्चिन्तनीयाः कर्तव्याश्च–पंच०१
2. क्योंकि, चूंकि–प्रियमाचरितं लते त्वया मे ......यदियं पुनरप्यपाङ्गनेत्रा परिवृत्तार्धमुखी मयाद्य दृष्टा–विक्रम० १।१७, या –किं शेषष्य भरव्यथा न वपुषि क्ष्मां न क्षिपत्येव यत् –मुद्रा० २।१८, रघु० १।२७, ८७, इस अर्थ में 'यद्' के पश्चात् इसका सहसम्बन्धी तद् या ततः आता है; दे० न० २२।४६ ।
समस्त पद
~अपि
(अव्य०) यद्यपि, अगर्चे–वक्रः पन्था यदपि भवतः –मेघ० २७,
~अर्थम्, ~अर्थे
(अव्य०)
1. जिस लिए, जिस कारण, जिस वास्ते, जिस हेतु, – श्रूयतां यदर्थमस्सि हरिणा भवत्सकाशं प्रेषितः–श० ६, कु० ५।५२
2. चूंकिं, क्योंकि –नूनं दैवं न शक्यं हि पुरुषेणातिवर्तितुम्, यदर्थं यत्नवानेव न लभे विप्रतां विभो–महा०,
~कारणम्, ~कारणात्
(अव्य०)
1. जिस लिए, जिस कारण
2. चूंकि, क्योंकि,
~कृते
(अव्य०) जिस लिए, जिस वास्ते, जिस पुरुष या वस्तु के लिए,
~भविष्यः
भाग्यवादी (जो कहता है –'जो होना है वह होगा') –पंच० १।३१८,
~वा
(अव्य०) अथवा, या,–नैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु:–भग० २।६ (भाष्यकार बहुधा इस शब्द को विकल्पार्थ बतलाते समय प्रयुक्त करते हैं),
~वृत्तम्
साहसिकता,
~सत्यम्
(अव्य०) निश्चय ही, सचाई तो यह है कि, सत्यतः सचमुच –अमङ्गलाशंसया वो वचनस्य यत्सत्यम् कंपितमिव मे हृदयम्–वेणी० १, मुद्रा० १, मृच्छ० ४ ।



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