रंज् (भ्वा० दिवा० उभ०–रजति-ते, रज्यति-ते, रक्त, कर्मवा० रज्यते, इच्छा० रिरंक्षन्ति)
1. रंगे जाने के योग्य, लाल रंग से रंगना, लाल होना, चमकना, –कोपरज्यन्मुखश्री:– उत्तर० ५।२. नेत्रे स्वयं रज्यतः–५।२६ नै० ३।१२०, ७।६०, २२।५२
2. रंगना, हलका रंगना, रंगीन बनाना, लाल करना, रंगलेप करना
3. अनुरक्त होना, भक्त बनना (अधि० के साथ) देवानियं निषधराजरुचस्त्यजंती रूपादरज्यत नलेन विदर्भसुभ्रुः –नै० १३।३८. सा० द० १११
4. मुग्ध होना, प्रेमासक्त होना, स्नेह की अनुभूति होना
5. प्रसन्न होना, सन्तुष्ट होना, खुश होना–प्रेर० (रंजयति-ते)
1. रंगना, हलका रंगना, रंगीन बनाना, लाल करना, रंगलेप करना –सा रंजयित्वा चरणौ कृताशीः – कु० ७।१९, ६।८१, कि० १।४०, ४।१४
2. प्रसन्न करना, तृप्त करना, मनाना, सन्तुष्ट करना –ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मा नरं न रंजयति–भर्तृ० २।३ (इस अर्थ में रजयति' भी दे० कि० ६।२५) स्फुरतु कुचकुंभयोरुपरि मणिमंजरी रंजयतु तव हृदयेशम् – गीत० १०
3. मेल करना, जीत लेना. सन्तुष्ट रहना –मनु० ७।१९
4. हरिण का शिकार करना (इस अथ 'में केवल रंजयति'),
अनु–
1. लाल होना, –शि० ९।७
2. स्नेहशील होना, भक्त होना, अनुरक्त बनना, प्रेम करना, पसन्द करना (अधि० के साथ कर्म० के भी) पंच० १।१०१, मनु० ३।१७३
3. खुश होना –भग० ११।३६
अप–
1. असन्तुष्ट होना, सन्तोषरहित होना (अपा० के साथ, नयहीनादपरज्यते जनः–कि० २।४९
2. पीला होना, विवर्ण होना – श्वासापरक्ताधरः – श० ६।५,
उप–
1. ग्रहणग्रस्त होना, उपरज्यते भगवांश्चन्द्र:–मुद्रा० १
2. हलके रंग का होना, रंगीन होना–शि० २।१०
3. कष्टग्रस्त या विपद्ग्रस्त होना
वि–
1. रंगरहित होना, मलिन होना, घटिया या भद्दा होना–केशा अपि विरज्यंते नि:स्नेहाः किं न सेवका:–पंच० १।८२ (यहाँ यह द्वितीयार्थ भी रखता है)
1. असन्तुष्ट होना, निर्लिप्त होना, नापसंद करना, घृणा करना–चिरानुरक्तोऽपि विरज्यते जन:–मृच्छ० १।५३, यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता–भर्तृ० २।२, भट्टि० १८।२२, संसार से विरक्त होना, सांसारिक आसक्तियों का छोड़ देना ।