रत्नम् [रमतेऽत्र, रम् +न, तान्तादेशः]
1. मणि, आभूषण, हीरा–किं रत्नमच्छा मतिः –भामि० १।८६, न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत्–कु० ५।४५, (रत्न गिनती में पांच, नौ या चौदह बतलाये जाते हैं–दे० शब्द–पंचरत्न, नवरत्न, और चतुर्दशरत्न)
2. कोई भी मूल्यवान् पदार्थ, कीमती खज़ाना
3. अपने प्रकार की अत्युत्तम वस्तु (समास के अन्त में) जातौ जातौ यदुत्कृष्टं तद्रत्नमभिधीयते–मल्लि०, कन्यारत्नमयोनिजन्म भवतामास्ते वयं चार्थिनः –महावी० १।३०, इसी प्रकार पुत्र°, स्त्री°, अपत्य° आदि
4. चुम्बक ।
समस्त पद
~अनुविद्ध
(वि०) रत्नों से जड़ा हुआ,
~आकार:
1. रत्नों की खान
2. समुद्र–रत्नेषु लुप्तेषु बहुष्वमर्त्यैरद्यापि रत्नाकर एव सिंधु:–विक्रम १।१२, रत्नाकरं वीक्ष्य–रघु० १३।१,
~आलोकः
मणि की कान्ति,
~आवली, ~माला
रत्नों का हार,
~कंदलः
मूंगा,
~खचित
(वि०) रत्न या मणियों से जड़ा हुआ,
~गर्भः
समुद्र
(–र्भा)
पृथ्वी,
~दीपः, ~प्रदीपः
1. रत्नों का वना दीपक
2. रत्न जो दीपक का काम, दे० –अर्चिस्तुंगानभिमुखमपि प्राप्य रत्न प्रदीपान्– मेघ० ६८,
~मुख्यम्
हीरा,
~राज्
(पुं०) लाल,
~राशिः
1. रत्नों का ढेर
2. समुद्र,
~सानुः
मेरु पर्वत,
~सू
(वि०) रत्नों को उत्पन्न करने वाला – रघु० १।६५,
~सू, ~सूतिः
(स्त्री०) पृथ्वी ।
रत्नम् [रम्+न, तान्तादेशः]
1. रत्न, जवाहर, मूल्यवान् पत्थर
2. कोई भी अमूल्य पदार्थ
3. कोई भी उत्तम या श्रेष्ठ वस्तु
4. जल
5 चुम्बक ।
समस्त पद
~अङ्गः
मूंगा,
~अचल:
आख्यानों में वर्णित लंका में स्थित एक पहाड़,
~कुम्भः
रत्नों से भरा हुआ घड़ा,
~कूटः
एक पहाड़ का नाम,
~गर्भः
1. कुबेर
2. समुद्र,
~गर्भगणपतिः
गणपति की एक विशेष मूर्ति,
~च्छाया
रत्नों की कान्ति रत्नच्छायाव्यतिकरमिव प्रेक्ष्यमेतत् पुरस्तात् – मेघ०,
~धेनुः
रत्नों के ढेर में (दान के लिए) दी जाने वाली प्रतीकात्मक गाय,
~पञ्चकम्
पाँच रत्न–सोना, चाँदी, मोती, हीरा, और मूंगा,
~वरम्
सोना ।
परिशिष्ट