रहस् (नपुं०) [रह् +असुन्]
1. एकान्तता, एकान्तवास, अकेलापन, एकाकीपन, निर्जनता –रघु० ३।३, १५।९२, पंच० १।१३८
2. उजड़ा हुआ या सुनसान स्थान, छिपने की जगह
3. भेद की बात, रहस्य
4. मैथुन, संभोग
5. गुप्त इन्द्रिय–(अव्य०) चुपचाप, आँख बचा कर, गुप्त रूप से. एकान्त में. निर्जनस्थान में, –अतः परीक्ष्य कर्तव्यं विशेषात्सङ्गतं रहः –श० ५।२४, प्रायः समास में–वृत्तं रहः प्रणयमप्रतिपद्यमाने –५।२३ ।
रंहस् (पुं०) [रंह् +असुन्, हुक् च]
1. चाल, वेग, –रघु० २।३४ शि० १२।७, कि० २।४०
2. आतुरता, प्रचण्डता, उत्कटता, उग्रता ।