संस्कृत-शब्दकोशः

रात्रिम्मन्व राद्ध

रात्री

रात्री (स्त्री०) [राति सुखं भयं वा रा+त्रिप् वा ङीप्]


रात–रात्रिर्गता मतिमतां वर मुञ्च शय्याम् –रघु० ५।६३, दिवा काकरवाद्भीता रात्रौ तरति नर्मदाम् ।
समस्त पद
~अट:
1. बेताल, पिशाच, भूत-प्रेत
2. चोर,
~अन्ध
(वि०) जिसे रात को दिखाई न दे,
~करः
चन्द्रमा,
~चरः
('रात्रिंचर' भी)
(स्त्री० –री)
1. निशाचर, डाकू, चोर
2. पहरेदार, आरक्षी, चौकीदार
3. पिशाच, भूत, प्रेत–(तं) यातं वने रात्रिचरी डुढौके–भट्टि० २।२३,
~चर्या
1. रात में इधर उधर घूमना
2. रात को होने वाला कार्य या संस्कार.
~जम्
तारा, नक्षत्रपुंज,
~जलम्
ओस,
~जागरः
1. रात को पहरा देना, रात को जागते रहना, – रात में बैठे रहना–रघु० १९।३४
2. कुत्ता,
~तरा
आधी रात, मध्यरात्रि,
~पुष्पम्
कुमुद (जो रात को ही खिलता है),
~योगः
रात का आ जाना,
~रक्षः, ~रक्षकः
पहरेदार, रखवाला,
~रागः
अंधकार, घना अंधेरा,
~वासस्
(नपुं०)
1. रात की वेशभूषा
2. अंधकार
~विगमः
रात का अंत, दिन का निकलना, पौ फटना, प्रभात का प्रकाश
~वेदः, ~वेदिन्
(पुं०) मुर्गा ।


रात्री [रा+त्रिप्, ङीप् वा]


1. रात
2. रात का अंधकार
3. हल्दी
4. ब्रह्मा के चार रूपों में से एक
5. दिन रात–मै० स० ८।१।१६ पर शा० भा०।
समस्त पद
~आगमः
रात का आना,
~द्विषः
सूर्य,
~नाथः
चन्द्रमा
~भुजङ्ग:, ~मणिः
चन्द्रमा,
~सत्रन्यायः
मीमांसा का एक सिद्धान्त जिसके अनुसार अर्थवाद में वर्णित फल ही ग्रहण किया जाता है जब कि विधि में कर्मफल का वर्णन न किया गया हो ।

परिशिष्ट



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