रुचिः (स्त्री०) [रुच्+कि]
प्रकाश, कान्ति, आभा, उज्ज्वलता,–रुचिमिन्दुदले करोत्यजः परिपूर्णेन्दुरुचिर्महीपतिः–शि० १६।७१, रघु० ५।६७, मेघ० १५
2. प्रकाश किरण–जैसा कि 'रुचिभर्तृ' में
3. छबि, रङ्ग, सौन्दर्य बहुधा समास के अन्त में–पटलं बहिर्बहलपङ्करुचि –शि० ९।१९
4. स्वाद, मजा–जैसा कि 'रुचिकर' में
5. सुस्वाद, भूख, क्षुधा
6. कामना, इच्छा,खुशी,
~स्वरुच्या
स्वेच्छा से, खुशी से
7. अभिरुचि, स्वाद–विमार्गगायाश्च रुचिः स्वकान्ते–भामि० १।१२५, 'अभिरुचि या प्रेम’ –न स क्षितीशो रुचये बभूव, भिन्नरुचिर्हि लोकः–रघु० ६।३०, नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम् –मालवि० १।४; 'संलग्न' 'व्यस्त' या 'अनुरक्त' के अर्थ में प्रयोग बहुधा समास के अन्त में–हिंसारुचे: –मा० ५।२९
8. प्रणयोन्माद, किसी की बात में लवलीनता ।
समस्त पद
~कर
(वि०)
1. स्वादिष्ट, चटपटा, मज़ेदार
2. इच्छा का उत्तेजक
3. पाचनशक्तिवर्धक, पौष्टिक,
~भर्तृ
(पुं०)
1. सूर्य–शि० ९।१७
2. पति ।