लक्ष्य (सं० कृ०) [लक्ष्+ण्यत्]
1. देखने के योग्य, अवलोकन करने योग्य, दृश्य, अवेक्षणीय, प्रत्यक्ष जानने के योग्य–दुर्लक्ष्यचिह्ना महतां हि वृत्ति:–कि० १७।२३
2. संकेतित या अभिज्ञेय (करणों के साथ या समास में) –दूराल्लक्ष्यं सुरपतिधनुश्चारुणा तोरणेन –मेघ० ७५, प्रवेपमानाधरलक्ष्यकोपया –कु० ५।७४, रघु० ४।५, ७।६०
3. ज्ञातव्य या प्राप्य, सुराग लगाने योग्य–कु० ५।७२, ८१
4. चिह्नित या चित्रित किया जाना
5. परिभाषा के योग्य
6. उद्दिष्ट किये जाने योग्य
7. अभिव्यक्त किया जाना या परोक्ष रूप से प्रकट किया जाना
8. खयाल किये जाने योग्य, चिन्तनीय,
~क्ष्यम्
1. उद्देश्य, निशाना, चिह्न, चांदमारी, उद्दिष्ट चिह्न, (आलं० से भी) –उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले –श० २।५, दृष्टिं लक्ष्येषु बध्नन् –मुद्रा० १।२, रघु० १।६१, ६।११, ९।६७, कु० ३।४७, ६४, ५।४९
2. निशान, निशानी
3. वस्तु जिसकी परिभाषा की गई है (विप० ‘लक्षण’) –लक्ष्यैकदेशे लक्षणस्यावर्तनमव्याप्तिः – तर्क०
4. परोक्ष या गौण अर्थ जो लक्षणा शक्ति से प्रतीत हों,–वाच्यलक्ष्यव्यंग्या अर्था:–काव्य० २
5. बहाना, झूठमूठ, छद्मवेश –इदानीं परोक्षे किं लक्ष्यसुप्तमुत परमार्थसुप्तमिदं द्वयं– मृच्छ० ३, ३।१८, कन्दर्प प्रवणमनाः सखीसिसिक्षालक्ष्येण प्रतियुवमञ्जलिं चकार–शि० ८।३५, रघु० ६।५८
6. लाख, सौ हजार ।
समस्त पद
~क्रम
(बि०) ध्वनि आदि अर्थ जिसकी प्रणाली (गौणरूप से) प्रत्यक्षज्ञेय है,
~भेदः, ~वेधः
निशाना लगाना–कि० ३।२७,
~सुप्त
(वि०) झूठमूठ सोया हुआ,
~हन्
(वि०) निशाना मारने वाला, (पुं०) बाण, तीर ।
लक्ष्यम् [लक्ष्+यत्]
1. ध्येय, उद्देश्य
2. चिह्न, टोकन
3. वह वस्तु जिसकी परिभाषा की गई है
4. गौण अर्थ, अप्रत्यक्ष अर्थ ।
समस्त पद
~अभिहरणम्
पारितोषिक, ले उड़ना,
~ग्रहः
निशाना बाँधना,
~सिद्धिः,
अपने उद्देश्य में सफलता ।
परिशिष्ट