ली
i (भ्वा० पर० लयति) पिघलना, विघटित होना ।
ii (क्र्या० पर० लिनाति)
1. जुड़ जाना
2. पिघलना –प्रायः 'वि' उपसर्ग के साथ ।
iii (दिवा० आ० लीयते, लीन)
1. चिपकना, दृढ़ता पूर्वक जमे रहना, जुड़ जाना–मालवि० ३।५
2. भुजपाश में बांधना, आलिंगन करना
3. लेटना, विश्राम करना, टेक लेना, ठहरना, रहना, दुबकना, छिपना, लुकना – (भृङ्गाङ्गनाः) लीयन्ते मुकुलान्तरेषु शनकैः संजातलज्जा इव –रत्न० १।२६, रघु० ३।९, श० ६।१६, कु० १।१२, ७।२१, भट्टि० १८।१३, कि० ५।२६
4. विघटित होना, पिघलना
5. चिपचिपा, लसलसा
6. लीन हो जाना, भक्त या अनुरक्त होना, – माधवमनसिजविशिखभयादिव भावना त्वयि लीना –गीत० ४
7. नष्ट होना लोप होना,–प्रेर० (लापयति-ते) लाययति–ते, लीनयति–ते लालयति-ते) पिघलाना, विघटित करना, तरल बनाना, गलाना ('लापयते' रूप सम्मान या सम्मानित करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है–जटाभिर्लापयते –पूजामधिगच्छति–तु० पा० १।३।७०),
अभि–
1. जुड़ना, चिपकना –रघु० ३।८
2. ढक लेना, ऊपर फैला देना –पश्चादुच्चैर्भुजतरुवनं मण्डलेनाभिलीनः– मेघ० ३८,
आ–
1. बस जाना, छिपना, दुबकना, विक्रम० २।२३,
2. जुड़ना, चिपकना –रघु० ४।५१,
नि–
1. चिपकना, जमे रहना, लेट जाना, आराम करना, बस जाना, उतर पड़ना –निलिल्ये मूर्ध्नि गृध्रोऽस्य –भट्टि० १४।७६, २।५
2. दुबकना, छिपना, अपने आपको छिपा लेना –गुहास्वन्ये न्यलेषत –भट्टि० १५।३२ निशि रहसि निलीय –गीत० २
3. अपने आपको छिपा लेना (अपा० के साथ) –मातुर्निलीयते कृष्णः –सिद्धा०
4. मरना, नष्ट होना,
प्र–
1. लीन होना, विघटित होना, गल जाना –आत्मना कृतिना च त्वमात्मन्येव प्रलीयसे –कु० २।१०, रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके – भग० ८।१८, मनु० १।५४
2. नष्ट होना. लोप होना
3. नाश को प्राप्त होना, नष्ट होना,
वि–
1. जुडना, चिपकना, जमे रहना
2. विश्राम करना, बस जाना, उतर पड़ना –पुरोऽस्य यावन्न भुवि व्यलीयत –शि० १।१२
3. विगलित होना, पिघल जाना, लीन होना – महावीर० ६।६०. ७।१४
4. लोप होना, ओझल होना
5. नष्ट होना,
सम्–
1. चिपकना, जुड़ना
2. लेट जाना, बस जाना, उतरना
3. दुबकना, छिपना
4. पिघलना ।