लोकः [लोक्यतेऽसौ लोक्+घञ्]
1. दुनिया, संसार, विश्व का एक प्रभाग (स्थूलरूप यदि कहा जाय तो लोक तीन हैं –स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल लोक; अधिक विस्तृत वर्गीकरण के अनुसार लोक चौदह हैं; सात तो पृथ्वी से आरम्भ करके ऊपर क्रमशः एक दूसरे के ऊपर अर्थात् 'भूर्लोक भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, और सत्य या ब्रह्मलोक, तथा अन्य सात पृथ्वी से नीचे की ओर एक दूसरे के नीचे –अर्थात् अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल)
2. भूलोक, पृथ्वी – इहलोके 'इस संसार में' (विप० परत्र)
3. मानव जाति, मनुष्य जाति, मनुष्य– लोकातिग, लोकोत्तर इत्यादि
4. प्रजा, राष्ट्र के व्यक्ति (विप० –राजा) – स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे लोकहेतोः – श० ५।७, रघु० ४।८
5. समुदाय, समूह, समिति आकृष्टलीलान् नरलोकपालान् –रघु० ६।१, शशाम तेन क्षितिपाललोकः – ७।३
6. क्षेत्र, इलाका, जिला प्रान्त
7. सामान्य जीवन, (संसार का) सामान्य व्यवहार –लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् – ब्रह्म० २।१।३३, यथा लोके कस्यचिदाप्तैषणस्य राज्ञः – शारी० (इसी ग्रन्थ के और अन्य स्थल)
8. सामान्य लोक प्रचलन (विप० वैदिक प्रयोग या वाग्धारा –वेदोक्ता वैदिकाः शब्दाः सिद्धा लोकाच्च लौकिकाः; प्रियतद्धिता दाक्षिणात्या; यथा लोके वेदे चेति प्रयोक्तव्ये यथा लौकिकवैदिकेष्वितिः प्रयुञ्जते – महा० (और अन्य अनेक स्थानों पर)–अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः–भग० १५।१८
9. दृष्टि, दर्शन
10. 'सात' या चौदह की संख्या ।
समस्त पद
~अतिग
(वि०) असाधारण, अतिप्राकृतिक,
~अतिशय
(वि०) संसार के लिए श्रेष्ठ, असाधारण,
~अधिक
(वि०) असाधारण, असामान्य, –सर्वं पंडितराजराजितिलकेनाकारि लोकाधिकम् –भामि० ४।४४, कि० २।४७,
~अधिपः
1. राजा
2. सुर, देव,
~अधिपतिः
संसार का स्वामी,
~अनुरागः
'मनुष्य जाति से प्रेम विश्वप्रेम, साधारण हितैषिता, परोपकार,
~अन्तरम्
'परलोक' दूसरी या, भावी जीवन – रघु० १।६९, ६।४५, ‘लोकान्तरं गम्’,
~प्राप्
मरना,
~अपवादः
सब लोगों में बदनामी, सार्वजनिक निन्दा – लोकापवादो बलवान्मतो मे –रघु० १४।४०,
~अभ्युदयः
लोककल्याण,
~अयन:
नारायण का नामांतर,
~अलोकः
एक काल्पनिक पहाड़ जो इस पृथ्वी को घेरे हुए है और निर्मल जल के उस समुद्र से परे स्थित है जिसने सात महाद्वीपों में से अन्तिम द्वीप को घेर रक्खा है, इस लोकालोक से परे घोर अन्धकार है, और इस ओर प्रकाश इस प्रकार यह पहाड़ इस दृश्ययान संसार को अन्धकार के प्रदेश से विभक्त करता है –प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोक इवाचल: – रघु० १।६८, (आगे की व्याख्या के लिए दे० मा० १०।७९ पर डा० भाण्डारकर का नोट),
(–कौ)
दृश्यमान और अदृष्ट लोक,
~आचारः
सामान्य प्रचलन, सार्वजनिक या साधारण प्रथा, लोकव्यवहार,
~आत्मन्
विश्व की आत्मा,
~आदिः
1. संसार का आरंभ
2. संसार का रचयिता,
~आयत
(वि०) नास्तिकतासंबंधी, अनात्मवाद संबंधी,
(–तः)
भौतिकवादी, नास्तिक, चार्वाक दर्शन का अनुयायी,
(–तम्)
भौतिकवाद नास्तिकता, (इसके बर्णन को सर्वदर्शनसंग्रह के प्रथम अध्याय में देखिये),
~आयतिकः
नास्तिक, अनात्मवादी,
~ईशः
1. राजा (संसार का प्रभु)
2. ब्रह्मा
3. पारा,
~उक्तिः
(स्त्री०)
1. कहावत, लोकोक्ति
2. सामान्य चर्चा, लोकमत,
~उत्तर
(वि०) असाधारण, असामान्य, अप्रचलित –लोकोत्तरा च कृतिः –भामि० १।६९, ७०, उत्तर० २।७,
(–रः)
राजा,
~एषणा
स्वर्ग की इच्छा,
~कण्टकः
कष्ट देने वाला या दुष्ट पुरुष, मानवजाति का अभिशाप – दे० कण्टक,
~कथा
सर्वप्रिय कहानी,
~कर्तृ, ~कृत्
(पुं०) संसार का रचयिता,
~गाथा
परंपरा से लोगों मे गाया जाने वाला गान,
~चक्षुस्
(नपुं०) सूर्य,
~चारित्रम्
लोकव्यवहार,
~जननी
लक्ष्मी का विशेषण,
~जित्
(पुं०)
1. बुद्ध का विशेषण
2. संसार का विजेता
~ज्ञ
(वि०) संसार को जानने वाला,
~ज्येष्ठः
बुद्ध का विशेषण,
~तत्त्वम्
मनुष्यजाति का ज्ञान,
~तन्त्रम्
जनतंत्र,
~तुषारः
कपूर,
~त्रयम्, ~त्रयी
सामूहिक रूप से तीनों लोक,–उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि – रघु० १४।७३,
~द्वारम्
स्वर्ग का दरवाजा,
~धातुः
संसार का विशेष प्रकार का विभाजन,
~धातृ
(पुं०) शिव का विशेषण,
~नाथः
1. ब्रह्मा
2. विष्णु
3. शिव
4. राजा, प्रभु
5. बुद्ध,
~नेतृ
(पुं०) शिव का विशेषण,
~पः, ~पाल:
दिक्पाल –ललिताभिनयं तमद्य भर्ता मरुतां द्रष्टुमनाः सलोकपाल: –विक्रम० २।१८, रघु० २।७५, २।८९, १७।७८, (लोकपाल गिनती में आठ हैं –दे० अष्ट दिक्पाल)
2. राजा, प्रभु,'
~पक्तिः
(स्त्री०) मनुष्यजाति का आदर, साधारण आदरणीयता,
~पतिः
1. ब्रह्मा का विशेषण
2. विष्णु का विशेषण
3. राजा, प्रभु,
~पथः, ~पद्धतिः
(स्त्री०) साधारण व्यवहार, दुनिया का तरीका,
~पितामहः
ब्रह्मा का विशेषण,
~प्रकाशनः
सूर्य,
~प्रवादः
किंवदन्ती अफ़वाह, सर्वसाधारण में प्रचलित बात,
~प्रसिद्ध
(वि०) सुज्ञात, विश्वविख्यात,
~बन्धुः, ~बान्धवः
सूर्य,
~बाह्य, ~वाह्य
(वि०)
1. समाज से बहिष्कृत बिरादरी से खारिज
2. दुनिया से भिन्न, सनकी अकेला
(–ह्यः)
जातिच्युत व्यक्ति,
~मर्यादा
मानी हुई या प्रचलित प्रथा,
~मातृ
(स्त्री०) लक्ष्मी का विशेषण,
~मार्गः
लोकसंमत प्रथा,
~यात्रा
1. दुनिया के मामले, लौकिक जीवनचर्या, लोकव्यवहार –एवं किलेयं लोकयात्रा – महावी० ७, यावदयं संसारस्तावत्प्रसिद्धैवेयं लोकयात्रा –वेणी० ३
2. सांसारिक अस्तित्व, जीवनचर्या –मा० ४
3. आजीविका, वृत्ति,
~रक्षः
राजा, प्रभु,
~रञ्जनम्
जनता को संतुष्ट करना, सर्वप्रियता,
~रवः
जनश्रुति, सार्वजनिक चर्चा,
~लोचनम्
सूर्य,
~वचनम्
सार्वजनिक किंवदन्ती, अफवाह,
~वादः
किंवदन्ती, सामान्य चर्चा, सार्वजनिक अफवाह –मां लोकवादश्रवणादहासी: –रघु० १४।६१,
~वार्ता
किंवदन्ती, अफवाह,
~विद्विष्ट
(वि०) जिससे सब लोग घृणा करते हों, जिसे लोग पसंद न करते हों,
~विधिः
1. कार्यविधि का प्रकार, लोक में प्रचलित प्रक्रिया
2. संसार का रचयिता,
~विश्रुत
(वि०) दूर दूरतक मशहूर, जगद्विख्यात, प्रसिद्ध, यशस्वी,
~वृत्तम्
1. लोक व्यवहार, संसार में प्रचलित प्रथा
2. इधर उधर की बातें, गपशप,
~वृत्तान्तः, ~व्यवहारः
1. लोकाचार, लोकरीति, साधारण प्रथा –श० ५
2. घटनाक्रम,
~श्रुतिः
(स्त्री०)
1. जनश्रुति
2. विश्वविख्यात कीर्ति,
~संकरः
संसार की साधारण अव्यवस्था,
~संग्रहः
1. समस्त विश्व,
2. लोककल्याण
3. लोगों की भलाई चाहना,
~साक्षिन्
(पुं०)
1. ब्रह्मा का विशेषण
2. अग्नि,
~सिद्ध
(वि०)
1. लोगों में प्रचलित, रिवाजी, प्रथागत
2. लोक या समाज द्वारा स्वीकृत,
~स्थितिः
(स्त्री०)
1. विश्व का अस्तित्व या संचालन, सांसारिक अस्तित्व
2. विश्वनियम,
~हास्य
(वि०) संसार द्वारा उपहसित, उपहसित, लोकनिंदित,
~हित
(वि०) मनुष्य जाति के लिए कल्याणकारी,
(–तम्)
जनसाधारण का कल्याण ।
लोकः [लोक्+घञ्]
1. संसार, विश्व का एक भाग
2. पृथ्वी, भूलोक
3. मनुष्य जाति
4. प्रजा
5. समूह
6. क्षेत्र
7. दृष्टि
8. वास्तविक स्थिति, प्रकाश –इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् –भाग० ८।३।२५
9. विषय, भोग्यवस्तु –उपपत्त्योपलब्धेषु लोकेषु च समो भव–महा० १२ ।२८८।११।
समस्त पद
~अनुग्रहः
मनुष्य जाति की समृद्धि,
~अनुवृत्तम्
लोकमत के अनुसार, जनसाधारण की आज्ञाकारिता,
~अभिलक्षित
(वि०) जिसे जनता चाहे, जनप्रिय,
~उपक्रोशनम्
लोगों में बुरी अफ़वाहें फैलाना –दश० २ ।२,
~दम्भक
(वि०) समाज को धोखा देने वाला, सामाजिक ठग,
~धर्मः
सांसारिक कर्तव्य,
~नाथः
सूर्य,
~परोक्ष
(वि०) संसार से छिपा हुआ,
~प्रत्ययः
सबका विश्वास, विश्व का प्राबल्य,
~भर्तृ
(वि०) जनसाधारण का पालक पोपक,
~यज्ञः
संसार के प्रति भला रहने की इच्छा लोकैषणा –महा० १०।१८।५ पर शा० भा०,
~रावण
(वि०) संसार को कष्ट देने वाला –रा० ३।३३।१,
~वर्तनम्
लोकव्यवहार जिससे संसार की स्थिति बनी रहे,
~विरुद्ध
(वि०) लोकमत के विपरीत,
~विसर्गः
1. संसार का अन्त
2. गौण सृष्टि,
~संबाधः
जनसमुदाय,
~सुन्दर
(वि०) जिसके सौन्दर्य की सब लोग प्रशंसा करें ।
परिशिष्ट