विरोधः [वि० –रुध्+घञ्]
1. प्रतिरोध, रुकावट, विघ्न
2. नाकेबंदी, घेरा, आबरण
3. प्रतिबन्ध, रोक
4. असंगति, असंबद्धता, परस्परविरोध
5. अर्थ विरोध वैषम्य
6. शत्रुता, दुश्मनी–विरोधो विश्रान्त:–उत्तर० ६।११, पंच० १।३३२, रघु० १०।१३
7. कलह, असहमति
8. संकट, दुर्भाग्य
9. (अलं० में) प्रतीयमान असंगति जो केवल शाब्दिक हो, तथा संदर्भ को ठीक से अन्वित करने पर स्पष्ट हो जाय; इसमें परस्पर बिरोधी प्रतीत होने वाले शब्द (जो वस्तुत: वैसे न न हों) सम्मिलित रहते है, वस्तुओं का ऐसा वर्णन करना जो मिली हुई प्रतीत हों, परन्तु वस्तुतः हों भिन्न भिन्न, (इस अलंकार का बाण और सुबंधु ने बहुत उपयोग किया है पुष्पवत्यपि पवित्रा, कृष्णोऽ प्यसुदर्शनः, भरतोऽपि शत्रुघ्नः आदि उदाहरण प्रसिद्ध हैं) मम्मट ने इसको परिभाषा दी है:–विरोधः सोऽविरोवेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः – काव्य० १०, इस अलंकार का नाम विरोधाभास भी है ।
समस्त पद
~उक्तिः(स्त्री०), ~वचनम्
परस्परविरोध, विरोध,
~कारिन्
(वि०) झगड़ा करने वाला,
~कृत्
(वि०) विरोधी (पुं०) शत्रु ।
विरोधः [वि+रुध्+घञ्]
1. वैपरीत्य, बाधा, विघ्न
2. प्रतिबन्ध
3. शत्रुता
4. कलह
5. असहमति
6. संकट ।
समस्त पद
~आभासः
वह अलंकार जहाँ विरोध प्रतीत होता हो, परन्तु वस्तुतः कोई विरोध न हो,
~उपमा
वैपरीत्य पर आधारित उपमा,
~परिहारः
1. विरोध का दूर होना, सामंजस्य स्थापित होना
2. प्रतीयमान विरोध की व्याख्या ।
परिशिष्ट