विशेष (वि०) [विगतः शेषो यस्मात्–प्रा० ब०]
1. अजीब
2. पुष्कल, प्रचुर –रघु० २।१४,
~षः
1. विवेचन, विभेदीकरण
2. प्रभेद, अन्तर –निर्विशेषो विशेषः –भर्तृ० ३।५०
3. विशिष्टतायुक्त अन्तर, अनोखा चिह्न, विशेष गुण, विशेषता, वैशिष्ट्य, प्रायः समास में प्रयुक्त तथा 'विशिष्ट' और 'अजीब' शब्दों से अनूदित –श० ६।६
4. अच्छा मोड़, रोग में मोड़, अर्थात् अपेक्षाकृत अच्छा परिवर्तन –अस्ति मे विशेषः –श० ३, 'अब अपेक्षाकृत अच्छा हूँ'
5. अवयव, अंग –पुपोष लावण्यमयान् विशेषान् –कु० १।२५
6. जाति, प्रकार, प्रभेद, भेद, ढंग (प्रायः समास के अंत में) –भूतविशेषः उत्तर० ४, परिमलविशेषान् –पंच० १, कदलीविशेषाः –कु० १।३६
7. विविध उद्देश्य, नाना प्रकार के विवरण (ब० व०) –मेघ० ५८, ६४
8. उत्तमता, श्रेष्ठता, भेद, –प्रायः समास के अन्त में, उत्तम, पूज्य, प्रमुख, उत्कृष्ट –अनुभावविशेषात्तु –रघु० १।३७, वपुर्विशेषेण –कु० ५।३१, रघु० २।७, ६।५, कि० ९।५८, इसी प्रकार आकृति विशेषाः 'उत्तम रूप' अतिथिविशेषः 'पूज्य अतिथि' आदि
9. अनोखा विशेषण, नो द्रव्यों में से प्रत्येक की शाश्वत विभेदक प्रकृति
10. (तर्क० में) वैयक्तिकता (विप० सामान्य) अनूठापन
11. प्रवर्ग, वर्ग
12. मस्तक पर चन्दन या केसर का तिलक
13. वह शब्द जो किसी अन्य शब्द के अर्थ को सीमित कर देता है, दे० विशेषण
14. ब्रह्मांड का नाम
15. (अलं० में) एक अलंकार का नाम जिसके तीन भेद बताये गये हैं, मम्मट ने इसकी परिभाषा यह दी है –
“विना प्रसिद्धमाधारमाधेयस्य व्यवस्थितिः ।
एकात्मा युगपद् वृत्तिरेकस्यानेकगोचरा ।
अन्यत्प्रकुर्वतः कार्यमशक्यान्यस्य वस्तुनः ।
तथैव करणं चेति विशेषस्त्रिविधः स्मृतः ॥”
–काव्य० १० ।
समस्त पद
~अतिदेशः
विशेष अतिरिक्त नियम, विशेष विस्तारित प्रयोग,
~उक्तिः
(स्त्री०) एक अलंकार जिसमें कारण के विद्यमान रहते हुए भी कार्य का होना नहीं पाया जाता –विशेषोक्तिरखंडेषु कारणेषु फलावचः – काव्य १०, उदा० हृदि स्नेहक्षयो नाभूत्स्मरदीपे ज्वलत्यपि,
~ज्ञ, ~विद्
(वि०)
1. भेदों को जानने वाला, गुणदोषविवेचक, पारखी
2. विद्वान्, बुद्धिमान् –भर्तृ० २।३,
~लक्षणम्, ~लिंगम्
विशेष या लक्षणदर्शी चिह्न,
~वचनम्
वि पाठ या विधि,
~विधिः, ~शास्त्रम्
विशेष नियम ।