विष्टप (पुं०, नपुं०) [विष् +कपन्, तु]
संसार, भुवन –कु० ३।२०, तु० त्रिविष्टप ।समस्त पद~हारिन् (वि०) जो संसार को प्रसन्न करता है –भर्तृ० २।२५ ।