विष्टरः [वि+स्तृ+अप्, षत्वम्]
1. आसन, (स्टूल, कुर्सी आदि) –रघु० ८।१८
2. तह, परत, बिस्तरा (कुश आदि घास का)
3. मुट्ठीभर कुशाघास
4. यज्ञ में ब्रह्मा का आसन.
5. वृक्ष ।
समस्त पद
~भाज्
(वि०) आसन पर बैठा हुआ, आसन पर विराजमान –कु० ७।७२,
~श्रवस्
(पुं०) विष्णु या कृष्ण का विशेषण –शि० १४।१२ ।