विसृत्वर (वि०) (स्त्री० –‘री’) [वि+सृ+ क्वरप्, तुक्]
1. इधर उधर फैलने वाला, व्याप्त होने वाला –विसृत्वरैरंबुरुहां रजोभिः –शि० ३।११2. रेंगना, सरकना ।