वृद्धिः [वृध् +क्तिन्]
1. विकास, वढ़ोत्तरी, वर्धन, सम्बर्धन –पुपोष वृद्धिं हरिदश्वदीधितेरनुप्रवेशादिव बालचन्द्रमाः –रघु० ३।२२, तपोवृद्धि, ज्ञानवृद्धि आदि
2. (चन्द्रमा का) वर्धित होना, चन्द्रमा की कलाओं का बढ़ना, पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः कलाक्षयः श्लाध्यतरो हि वृद्धेः –रघु० ५।१६, कु० ७।१
3. धन की वृद्धि, समृद्धि, धनाढ्यता –पंच० २।११२
4. सफलता, बढ़ावत, उन्नति, प्रगति –परिवृद्धिमत्सरि मनो हि मानिनां –शि० १५।१
5. दौलत, जायदाद
6. ढेर, परिमाण, समुच्चय
7. सूद, व्याज, सरला वृद्धिः, चक्रवृद्धि:
8. सूदखोरी
9. लाभ फायदा
10. अंडकोष की वृद्धि
11. शक्ति या राजस्व का विस्तार
12. (व्या० में) स्वरों का लंबा करना या वृद्धि, अ, इ, उ, ऋ (चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ) और लृ को क्रमशः आ, ऐ, औ, आर् और आल् में बदलना
13. परिवार में, (प्रसव के कारण) उत्पन्न अशौच, जननाशौच ।
समस्त पद
~आजीवः, ~आजीविन्
(पुं०) सूदखोर, साहूकार, व्याज पर रुपया उधार देनेवाला,
~जीवनम्, ~जीविका
सूदखोरी, साहूकारी,
~द
(वि०) समृद्धि को उन्नत करने वाला,
~पत्रम्
एक प्रकार का उस्तरा,
~श्राद्धम्
पुत्रजन्मादि के उत्सवों पर पितरों का श्राद्ध, नान्दीमुख श्राद्ध ।
वृद्धिः (स्त्री०) [वृध्+क्तिन्]
1. आघात, चोट (वृध् हिंसायाम् )
2. भूमि का ऊँचा करना
3. लम्बा करना ।
परिशिष्ट