संस्कृत-शब्दकोशः

वेथ् वेदण्ड

वेद

वेदः [विद्+घञ् , अच् वा]


1. ज्ञान
2. आध्यात्मिक या धार्मिक ज्ञान, हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ (मूलरूप से केवल तीन वेद थे, ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेद जिन्हें समष्टिरूप से 'त्रयी' कहते थे, परन्तु बाद में 'अथर्ववेद' उनके साथ जोड़ दिया गया । प्रत्येक वेद के दो भाग हैं –मन्त्र या संहिता पाठ तथा ब्राह्मण भाग । हिन्दुओं की निरी धर्मनिष्ठता के अनुसार वेद अपौरुषेय (जो पुरुषों द्वारा की गई रचना न हो) हैं, क्योंकि वह परमात्मा से प्रकट हुए या सुने गये हैं, इसीलिए उन्हें 'श्रुति' कहते हैं, इसके विपरीत 'स्मृति' अर्थात् जो याद रखे जायं या जो पुरुषों की कृति हो; दे० 'श्रुति' तथा 'स्मृति' भी, इसीलिए बहुत से ऋषि जिनका नाम वेद के सूक्तों से संबद्ध है 'द्रष्टारः’ देखने वाले कहलाते हैं, उन्हें 'कर्तारः' या 'स्रष्टारः' अर्थात् रचयिता नहीं कहा जाता)
3. कुशा घास का गुच्छा –मनु० ४।३६,
4. विष्णु का नाम ।
समस्त पद
~अङ्गम्
'वेद का अंग' एक प्रकार के ग्रन्थ जो मंत्रोच्चारण, व्याख्या और संस्कारों में यत्र–तत्र सही विनियोग में सहायता देने के लिए प्रयुक्त होते हैं, अतः वेदाध्ययन में सहायक हैं, (वेदांग गिनती में छः हैं
1. शिक्षा, अर्थात् उच्चारण–विज्ञान
2. छंदस् छन्दः शास्त्र,
3. व्याकरण
4. निरुक्त अर्थात् वेद के कठिन शब्दों की निर्वचनपरक व्याख्या
5. ज्योतिष अर्थात् नक्षत्रविद्या या गणितज्योतिष और
6. कल्प अर्थात् कर्मकाण्ड या अनुष्ठानपद्धति),
~अधिगमः, ~अध्ययनम्
धार्मिक अध्ययन, वेदाध्ययन,
~अध्यापकः
वेद को पढ़ाने वाला, धर्मगुरु,
~अन्तः
1. 'वेद का अन्त' (वेद के अन्त में आने वाली) उपनिषद्
2. हिन्दुओं के छ: मुख्य दर्शनों में अन्तिम दर्शन ('वेदान्त' इसलिए कहलाता है कि यह वेद के अन्तिम ध्येय और कार्यक्षेत्र की शिक्षा देता है, या इसलिए कि यह उन उपनिषदों पर आधारित हैं जो वेद का अन्तिम भाग हैं), (दर्शन की इस पद्धति को कभी–कभी 'उत्तरमीमांसा' के नाम से पुकारते हैं, यही जैमिनि की पूर्वमीमांसा का उत्तरार्ध, या अन्तिम भाग है, परन्तु व्यवहारतः यह एक स्वतंत्र शास्त्र है, दे० मीमांसा, यह हिन्दुओं के 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के सर्वेश्वरवाद का प्रवर्तक है, इसके अनुसार समस्त विश्व एक ही अनादि शक्ति अर्थात् ब्रह्म या परमात्मा का संश्लिष्ट रूप है, दे० 'ब्रह्मन्' भी)
°गः, °ज्ञः
वेदान्त दर्शन का अनुयायी,
~अन्तिन्
(पुं०) वेदान्त दर्शन का अनुयायी,
~अर्थः
वेदों का अर्थ,
~अवतारः
वेदों का प्रकटीकरण, अर्थात् ईश्वरीय संदेश,
~आदि
(नपुं०),
~आदिवर्णः, ~आदिबीजम्
'ओम्' की पुनीत ध्वनि,
~उक्त
(वि०) शास्त्रसम्मत, वेदविहित,
~कौलेयकः
शिव का विशेषण,
~गर्भः
1. ब्रह्म का विशेषण
2. वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण,
~ज्ञः
वेदों को जानने वाला ब्राह्मण,
~त्रयम्, ~त्रयी
सामूहिक रूप से तीनों वेद,
~निन्दकः
नास्तिक, पाखण्डी, श्रद्धाहीन (जो वेद के स्वरूप तथा उसके अपौरुषेयत्व पर विश्वास नहीं करता है),
~निन्दा
अविश्वास, पाखण्ड,
~पारगः
वेदों में पारंगत ब्राह्मण,
~मातृ
(स्त्री०) वैदिक पुनीत मंत्र, गायत्रीमंत्र,
~वचनम्, ~वाक्यम्
वेद का मूलपाठ,
~वदनम्
व्याकरण,
~वासः
ब्राह्मण,
~बाह्य
(वि०) वेद के विरुद्ध, जो वेद में उपलब्ध न हो,
~विद्
(पुं०) वेदविशारद ब्राह्मण,
~विहित
(वि०) वेदों में जिसका विधान पाया जाय,
~व्यासः
व्यास का विशेषण जिसने वेदों को वर्तमान रूप दिया है, दे० व्यास,
~संन्यासः
वेदों के कर्मकाण्ड का त्याग ।


वेद: [विद्+अच् , घञ् वा]


1. ज्ञान
2. हिन्दुओं की पुनीत धर्म पुस्तक ––ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद
3. 'कुश' का गुच्छा
4. विष्णु ।
समस्त पद
~अनध्ययनम्
वह अवकाश का दिन जिस दिन वेद का पढ़ना निषिद्ध हो,
~बाह्य
(वि०)
1. वेद के विपरीत
2. वेदाध्ययन के क्षेत्र से बाहर,
~वादः
वेदों के विषय में होने वाली धर्मान्ध व्यक्तियों की बहस –वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः –भग०
~श्रुतिः
ईश्वरीय ज्ञान का दैवी संदेश ।

परिशिष्ट



Correction: