संस्कृत-शब्दकोशः

व्यभिचारिणी व्यभीचार

व्यभिचारिन्

व्यभिचारिन् (वि०) [व्यभिचार+इनि]


1. भटका हुआ, भूला हुआ, पथभ्रष्ट, भ्रान्त, नियम भंग करने वाला
2. अनियमित, असंगत
3. असत्य, मिथ्या –दे० अव्यभिचारिन्
4. श्रद्धाहीन, जो ब्रह्मचारी न हो, परस्त्रीगामी, (पुं०)
~व्यभिचारिभावः
संचारिभाव, सहकारी भाव) (विप० ‘स्थायी भाव’) यद्यपि स्थायी भावों की भाँति यह सहकारी भाव रस का कोई आधारभूत रूप नहीं बनाते, फिर भी यह प्रवहमान रस के पोषक हैं, अतः प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह रस की पुष्टि करते हैं । इनकी संख्या तेंतीस या चौंतीस है, इनकी गणना के लिए दे० काव्य० ४, कारिका ३१–३४, सा० द० १६९, या रस० प्रथम आनन, तु० विभाव और स्थायिभाव की ।


व्यभिचारिन् (वि०) [वि+अभि+चर्+णिच्+णिनि]


1. कुमार्गगामी, दुश्चरित्र
2. अस्थायी ।

परिशिष्ट



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