व्रत (पुं०, नपुं०) [व्रज्+घ, जस्य तः]
1. भक्ति या साधना का धार्मिक कृत्य, प्रतिज्ञात का पालन, प्रतिज्ञा, पण –अभ्यस्यतीव व्रतमासिधारम् –रघु० १३।६७, २।४,२५,(भिन्न भिन्न पुराणों में अनेक व्रतों का वर्णन किया गया है परन्तु उनकी संख्या निश्चित नहीं हो सकी क्योंकि बराबर नये नये व्रतों की रचना प्रतिदिन होती रहती है यथा सत्यनारायण व्रत
2. संकल्प, प्रतिज्ञा, दृढ़ निश्चय –सोऽभूत् भग्नव्रतः शत्रूनुद्धृत्य प्रतिरोपयन् –रघु० १७।४२, इसी प्रकार 'सत्यव्रत, दृढ़व्रत' इत्यादि
3. भक्ति या आस्था का पदार्थ, भक्ति, जैसा कि पतिव्रता (पतिर्व्रतं यस्याः सा) –यान्ति देवव्रता देवान् पितृन् यान्ति पितृव्रता: –भग० ९।२५
4. संस्कार अनुष्ठान, अभ्यास, जैसा कि 'अर्कव्रत' में
5. जीवनचर्या, आचरण, चालचलन –श० ५।२६
6. अध्यादेश, विधि, नियम
7. यज्ञ
8. कर्म, करतब, कार्य ।
समस्त पद
~आचरणम्
किसी प्रतिज्ञा का पालन करना,
~आदेशः
(किसी द्विज के) बालक का यज्ञोपवीत संस्कार,
~उपवासः
किसी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए अनशन करना,
~ग्रहणम्
किसी धार्मिक अनुष्ठान को पूरा करने के लिए संकल्प लेना,
~चर्यः
ब्रह्मचारी, वेदविद्यार्थी दे० ब्रह्मचारिन्,
~चर्या
ब्रह्मचर्य का पालन करना,
~पारणम्, –णा
उपवास खोलना या प्रतिज्ञा की सफल समाप्ति,
~भङ्गः
1. संकल्प तोड़ना
2. प्रतिज्ञा तोड़ना,
~भिक्षा
उपनयन संस्कार के अवसर पर भिक्षा मांगना,
~लोपनम्
प्रतिज्ञा को तोड़ना,
~वैकल्यम्
किसी धार्मिक संकल्प का अधूरा रह जाना,
~संग्रहः
व्रत की दीक्षा लेना,
~स्नातकः
वह ब्राह्मण जिसने ब्रह्मचर्य आश्रम की अवस्था को पूरा कर लिया है अर्थात् ब्रह्मचर्य नामक प्रथम आश्रम –दे० स्नातक ।
व्रतः [व्रज्+घ, जस्य तः]
मानसिक क्रिया कलाप व्रतमिति च मानसं कर्म उच्यते –मी० सू० ६।२ ।२० पर शा० भा०।
समस्त पद
~धारणम्
एक धार्मिक व्रत का धारण करना ।
परिशिष्ट
व्रतम् [व्रज्+घ, जस्य तः]
मानसिक क्रिया कलाप व्रतमिति च मानसं कर्म उच्यते –मी० सू० ६।२ ।२० पर शा० भा०।
समस्त पद
~धारणम्
एक धार्मिक व्रत का धारण करना ।
परिशिष्ट