शास् (अदा० पर० शास्ति, शिष्ट)
1. अध्यापन करना, शिक्षण प्रदान करना, प्रशिक्षित (इस अर्थ में धातु द्विकर्म० है) माणवकं धर्म शास्ति–सिद्धा०, भट्टि ६।१०, शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् – भग० २।७
2. राज्य करना, शासन करना,–अनन्यशासनामुर्वीं शशासैकपुरीमिव–रघु० १।३०, १०।१, १४।८५, १९।५७, श० १।१४, भट्टि० ३।५३
3. आज्ञा देना, समादिष्ट करना, निदेश देना, हुक्म देना –रघु० १२।३३४, कु० ६।२४, भट्टि० ९।६८
4. कहना, सम्वाद देना, सूचित करना, (संप्र० के साथ) –तस्मिन्नायोधनं वृत्तं लक्ष्मणायाशिषन्महत्–भट्टि० ६।२७, मनु० ११।८२
5. उपदेश देना–स किं सखा साधु न शास्ति योऽधिपम् –कि० १।५
6. आदेश देना, राजाज्ञा लागू करना
7. दण्ड देना, सज़ा देना, निर्दोष बनाना, मनु० ४।१७५, ८।२९
8. सधाना, वशीभूत करना, महावी० ६।२०,
अनु–
1.
(क) उपदेश देना, प्रेरित करना–कु० ५।५,
(ख) अध्यापन करना, शिक्षण प्रदान करना, आज्ञा देना, आदेश करना – रघु० ६।५९, १३।७५, भट्टि० २०।१७
2. राज्य करना, शासन करना
3. सज़ा देना, दण्ड देना –वेणी० २
4. प्रशंसा करना, स्तुति करना,
आ–
(बहुधा आ०)
1. आशीर्वाद देना, आशीर्वाद उच्चारण करना, ऋक्छन्दसा आशास्ते–श० ४, उत्तर० १
2. आज्ञा देना, आदेश देना, निदेश देना (इस अर्थ में पर०) भट्टि० ६।४
3. इच्छा करना, खोजना, आशा करना, प्रत्याशा करना–सर्वमस्मिन्वयमाशास्महे –श० ७, आशासतं ततः शान्तिमस्तुरग्नीनहावयत्–भट्टि० १७।१० ५।१६, मनु० ३।८०
4. प्रशंसा करना,
प्र–
1. अध्यापन करना, शिक्षण देना, उपदेश करना, भट्टि० १९।१९
2. आदेश देना, समादिष्ट करना –प्रशाधि यन्मया कार्यम् –मार्कण्डेय०
3. राज्य करना, शासन करना, प्रभु बनना – द्यां प्रशाधि गलितावधिकालम् –नै० ५।२४, रघु० ६।७६, ९।१
4. दण्ड देना, सज़ा देना
5. प्रार्थना करना, याचना करना, तलाश करना, (आ०)–इदं कविभ्यः पूर्वेभ्यो नमोवाकं प्रशास्महे –उत्तर० १।१ (आपूर्वक शास् के अर्थ में प्रयुक्त) ।