शृङ्गम् [शृ+गन्, पृषो० मुम् ह्रस्वश्च]
1. सींग–वन्यैरिदानीं महिषैस्तदम्भः शृङ्गाहतं क्रोशति दीर्घिकाणाम् –रघु० १६।१३, गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शृङ्गैमुर्हुस्ताडितम् – श० २।६
2. पहाड़ की चोटी – अद्रे: शृङ्गं हरति पवनः किं स्विदित्युन्मुखीभिः–मेघ० १४,५२, कि० १५।४२, रघु० १३।२६
3. भवन की चोटी, बुर्जी
4. उत्तुंगता, ऊँचाई
5. प्रभुता, स्वामित्व, सर्वोपरिता, प्रमुखता– शृङ्गं स दृप्तविनयाधिकृतः परेषामत्युच्छ्रितं न ममृषे न तु दीर्घमायुः –रघु० ९।६२, (यहां शब्द का अर्थ 'सींग' भी है)
6. चद्रचूड़ा, चाँद की नोक
7. चोटी, नोक, अग्रभाग
8. (भैंस आदि का) सींग जो फूंक मार कर बजाया जाता है
9. पिचकारी – वर्णोदकैः काञ्चन शृङ्गमुक्तैः –रघु १६।७०
10. कामोद्रेक, अभिलाषोदय
11. निशान, चिह्न
12. कमल ।
समस्त पद
~अन्तरम्
(गौ आदि पशुओं के ) सींगों का मध्यवर्ती स्थान,
~उच्चयः
ऊँची चोटी,
~जः
बाण
(–जम्)
अगर की लकड़ी,
~प्रहारिन्
(वि०) सींग से मारने वाला,
~प्रिय:
शिव का विशेषण,
~मोहिन्
(पुं०) चम्पक वृक्ष,
~वेरम्
1.वर्तमान मिर्जापुर के निकट गंगा के किनारे बसा हुआ एक नगर–उत्तर० १।२१
2. अदरक ।
शृङ्गम् [शृ+गन् मुम्,ह्रस्वश्च]
1. सींग
2. पर्वत की चोटी
3. ऊँचाई
4. स्त्री का स्तन
5. एक विशेष प्रकार का सैनिक व्यूह ।
समस्त पद
~ग्राहिका
1. प्रत्यक्षरीति
2. (तर्क० में) एक पक्ष लेना ।
परिशिष्ट