षष् (संख्या० वि०) [सो+क्विप्, पृषो०]
(केबल ब० व० में प्रयक्त कर्तृ० षट्, संबं० षण्णाम् ) छः–मनु० १।१६, ८।४०३ ।
समस्त पद
~अक्षीणः
(षडक्षीणः) मछली,
~अङ्गम्
समष्टि रूप से ग्रहण किये गये शरीर के छ: भाग–जंघे बाहू शिरोमध्यं षडङ्गमिदमुच्यते
2. वेद के छः अंग सहायक भाग, –
“शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दसां चितिः ।
ज्योतिषामयनं चैव षडङ्गो वेद उच्यते ॥”
, दे० 'वेदांग' भी
3. छः शुभ वस्तुएँ –अर्थात् गोमाता से प्राप्त छ: पदार्थ–
“गोमूत्रं गोमयं क्षीरं सर्पिदधि च रोचना ।
षडंगमेतन्मांगल्यं पठितं सर्वदा गवाम् ॥”
~अङ्घ्रिः
(‘षडङ्घ्रिः’) भौंरा,
~अधिक
(वि०) (‘षडधिक’) वह जिसमें छः अधिक हों, –मा० ५।१,
~अभिज्ञः
(‘षडभिज्ञः’) देवरूप बौद्ध महात्मा,
~अशीत
(वि०) (‘षडशीत’) छ्यासीवाँ,
~अशीतिः
(स्त्री०) (‘षडशीतिः’) छ्यासी,
~अहः
(‘षडहः’) छ: दिन का समय या अवधि,
~आननः, ~वक्त्रः, ~वदनः
(‘षडाननः, षड्वक्त्रः, षड्वदनः’) कार्तिकेय के विशेषण –षडाननापीतपयोधरासु नेता चमूनामिव कृत्तिकासु – रघु० १४।२२,
~आम्नायः
(‘षडाम्नायः’) छः तन्त्र,
~ऊषणम्
(‘षडूषणम्’) समष्टि रूप से ग्रहण किये हुए छ: मसाले–पंचकोलं स मरिचं षडूषणमुदाहृतम्,
~कर्ण
(वि०) (‘षट्कर्ण’) छ: कानों से सुना गया, अर्थात् वक्ता और श्रोता के अतिरिक्त किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा भी सुना गया, एक से अधिक श्रोताओं को सुनाया गया (परामर्श, भेद आदि)–षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रः –पंच० १।९९,
(–र्णः)
एक प्रकार की वीणा,
~कर्मन्
(नपुं०) (‘षट्कर्मन्’)
1. ब्राह्मणों के लिए विहित 'छः कर्तव्य–
“अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट्कर्माण्यग्रजन्मनः ॥”
– मनु० १०।७५
2. छ: कर्म जो ब्राह्मण की जीविका के लिए विहित हैं –
“उञ्छं प्रतिग्रहो भिक्षा वाणिज्यं पशुपालनम् ।
कृषिकर्म तथा चेति षट्कर्माण्यग्रजन्मन: ॥”
3. जादू के छः करतब शान्ति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेष, उच्चाटन तथा मारण
4. योगाभ्याससंबंधी छः क्रियाएँ–
“धौतिर्वस्ती तथा नेती (नौलिकी) त्राटकस्तथा ।
कपालभाती चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ॥”
(पुं०) ब्राह्मण,
~कोण
(वि०) (‘षट्कोण’)
1. छ: कोणों से युक्त
(–णम्)
1. षड्भुज, छः कोनिया
2. इन्द्र का वज्र,
~गवम्
(‘षड्गवम्’)
1. छ: बैलों की जोड़ी
2. वह जुवा जिसमें छः बैल जोते जायं (कभी कभी अन्य जानवरों के नाम पर) उदा०
°हस्ति, °अश्व
छ: हाथी छः घोड़े आदि,
~गुण
(वि०) (‘षड्गुण’)
1. छः गुना
2. छ: विशेषणों से युक्त
(–णम्)
1. छ: गुणों का समुदाय
2. किसी राजा की विदेशनीति में प्रयोक्तव्य छ: उपाय–दे० 'गुण' के अन्तर्गत (२१), तु० 'षाड्गुण्य' के साथ भी,
~ग्रन्थि
(वि०) (‘षड्ग्रन्थि’) पिप्परामूल,
~ग्रन्थिका
(‘षट्ग्रन्थिका’) शटी, आमाहल्दी,
~चक्रम्
(‘षट्चक्रम्’) शरीर के छः रहस्यमय चक्र (मूलाधार, अधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा),
~चत्वारिंशत्
(‘षट्चत्वारिंशत्’) छ्यालीस,
~चरणः
(‘षट्चरणः’)
1. मधुमक्खी
2. टिड्डी
3. जूँ,
~जः
(‘षड्जः’) भारतीय स्वरग्रामके सात प्राथमिक स्वरों में से चौथा स्वर (कुछ के अनुसार पहला) क्योंकि यह स्वर छः अंगों से व्युत्पन्न है–
“नासांकठमुरस्तालु जिह्वां दन्तांश्च संस्पृशन् ।
षड्जः संजायते (षड्भ्यः संजायते) यस्मात् तस्मात् षड्ज इति स्मृतः ॥”
, कहते हैं कि मोर के स्वर से यह स्वर मिलता-जुलता है,–षड्जं रौति मयूरस्तु–नार० षड्जसम्वादिनी: केका: द्विधा भिन्ना: शिखण्डिभिः – रघु० १।३९,
~त्रिंशत्
(स्त्री०) (‘षट्त्रिंशत्’) छत्तीस (‘षट्त्रिंश’) (वि०) छत्तीसवाँ,
~दर्शनम्
(‘षड्दर्शनम्’) हिन्दू दर्शन के छः मुख्य शास्त्र – सांख्य, योग, न्याय, वैशैषिक, मीमांसा और वेदान्त,
~दुर्गम्
(‘षड्दुर्गम्’) छः प्रकार के गढ़ों की समष्टि –
“धन्वदुर्गं महीदुर्गं गिरिदुर्गं तथैव च ।
मनुष्यदुर्गं मृद्