मोघ (वि०) [मुह्+घ अच् वा, कुत्वम्]
1. व्यर्थ, अर्थहीन, निष्फल, लाभरहित. असफल–याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा–मेघ० ६, मोघवृत्ति कलभस्य चेष्टितम्–रघु० ११।३९, १४।६५, भग० ९।१२
2. निरुद्देश्य, निष्प्रयोजन, अनिश्चित
3. छोड़ा गया परित्यक्त
4. आलसी,
~घः
बाड़, घेरा, झाडबन्दी,
~घम्
(अव्य०) व्यर्थ, बिना किसी प्रयोजन के, बिना किसी उपयोग के ।
समस्त पद
~कर्मन्
(वि०) अनुपयुक्त कार्यों में व्यस्त,
~पुष्पा
बांझ स्त्री ।