मोहः [मुह्+घञ्]
1. चेतना की हानि, मूर्छित होना, निःसंज्ञा, बेहोशी–मोहेनान्तर्वरतनुरियं लक्ष्यते मुच्यमाना–विक्रम० १।८, कु० ३।७३
2. घबराहट, व्यामोह, उद्विग्नता, अव्यवस्था–यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव–भग० ४।३५
3. मूर्खता, अज्ञान, दीवानापन –तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् –रघु० १।२, श० ७।२५
4. त्रुटि, भूल, अशुद्धि
5. आश्चर्य, अचम्भा
6. कष्ट, पीढ़ा
7. जादू की कला जो शत्रु को परास्त करने में प्रयुक्त की जाय
8. (दर्शन० में) व्यामोह जो सत्य को पहचानने में अवरोधक है, (इसके अनुसार मनुष्य को सांसारिक पदार्थों की वास्तविकता में विश्वास होता है, और वह विषय सुखों से तृप्ति करने का अभ्यस्त हो जाता है) ।
समस्त पद
~कलिल
मोटा और व्यामोहक जाल,
~निद्रा
अन्धविश्वास,
~मन्त्रः
व्यामोहक जादू,
~रात्रिः
(स्त्री०) प्रलय की रात जब कि समस्त विश्व नष्ट हो जायेगा,
~शास्त्रम्
मिथ्या सिद्धान्त या गुरु ।