ययातिः [यस्य वायोरिव यातिः सर्वत्र रथगतिर्यस्य]
एक प्रसिद्ध चन्द्रवंशी राजा का नाम, नहुष का पुत्र, [ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से विवाह किया । दैत्यों के राजा वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा दासी के रूप में देवयानी के साथ गई, क्योंकि इसने किसी समय देवयानी का अपमान किया था और उस अपमान की क्षति पूर्ति के लिए आज शर्मिष्ठा को देवयानी की सेविका बनना पड़ा (दे० देवयानी) । परन्तु ययाति को इस दासी से प्रेम हो गया, फलतः उसने गुप्त रूप से उससे विवाह कर लिया । इस बात से खिन्न होकर देवयानी अपने पिता के पास चली गई और उनसे अपने पति के आचरण की शिकायत की । शुक्राचार्य ने ययाति को प्राक्कालिक वार्धक्य तथा अशक्तता से ग्रस्त कर दिया ।ययाति ने जब बहुत अनुनय–विनय किया तो प्रसन्न होकर शुक्राचार्य ने ययाति को अनुमति दे दी कि वह अपने बुढापे को जिस किसी को दे सकता है यदि वह लेना स्वीकार करे । उसने अपने पाँचों पुत्रों से पूछा, परन्तु सब से छोटे पुरु को छोड़कर किसी ने भी बुढ़ापा लेना स्वीकार नहीं किया । फलस्वरूप ययाति ने अपना बुढ़ापा पुरु को देकर उसकी जवानी ले ली । इस प्रकार इस समृद्ध यौवन को पाकर ययाति फिर विषयवासनाओं तथा आमोद प्रमोद में व्यस्त रहने लगा । इस प्रकार का क्रम १००० वर्ष तक चला परन्तु ययाति की तृप्ति नहीं हुई । आखिरकार, बड़े प्रयत्न के साथ ययाति ने इस विलासी जीवन को छोड़कर, पुरु की जवानी उसको वापिस कर दी और उसे राज्य का उत्तराधिकारी बनाकर स्वयं पवित्रजीवन बिताने तथा परमात्मचिन्तन करने के लिए बन को प्रस्थान किया]