युगम् [युज्+घञ् कुत्वम्, गुणाभावः]
1. जुआ (पुं० भी इस अर्थ में) –युगव्यायत बाहुः रघु० ३।३४, १०।६७, शि० ३।६८
2. जोड़ा, दम्पती, युगल –कुचयोर्युगेन तरसा कलिता –शि० ९।७२, स्तनयुग –श० १।१९
3. श्लोकार्ध जिसमें दो चरण होते हैं, युग्म
4. सृष्टि का युग (युग चार है: कृत या सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि– प्रत्येक की अवधि क्रमशः १७२८०००, १२९६०००, ८६४००० और ४३२००० वर्ष है, चारों को मिलाकर ४३२०००० वर्ष का एक महायुग होता है) ऐसा माना जाता है कि युगों की उत्तरोत्तर घटती हुई अवधि के अनुसार शारीरिक और नैतिक शक्ति भी मनुष्यों में बराबर गिरती गई है । संभवतः इसीलिए कृतयुग को स्वर्णयुग और कलियुग को लौहयुग कहते हैं) धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे –भग० ४।८, युगशतपरिवर्तान्–श० ७।३४
5. पीढ़ी, जीवन,– आ सप्तमाद्युगात् –मनु० १०।६४, जात्युत्कर्षो युगे ज्ञेयः पञ्चमे सप्तमेऽपि वा –याज्ञ० १।९६ (युगे =जन्मनि मिता० )
6. 'चार' की संख्या की अभिव्यक्ति, 'बारह' की संख्या के लिए विरलप्रयोग ।
समस्त पद
~अन्तः
1. जुए का किनारा
2. युग का अन्त, सृष्टि का अन्त या विनाश – युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकासमासत –शि० १।२३, रघु० १३।६
3. मध्याह्न, दोपहर,
~अवधिः
सृष्टि का अन्त या विनाश शि० १७।४०,
~कीलकः
ज़ुए की कीली
~पार्श्वग
(वि०) जुए के पास जाने वाला, जुए में जुतने वाला बैल,
~बाहु
(वि०) लम्बी भुजाओं वाला–कु० २।१८ ।
युगम् [युज्+घञ् , कुत्वं, न गुणः]
1. ज़ूआ
2. जोड़ा
3. चन्द्रमा की सापेक्ष स्थिति ।
समस्त पद
~धुर्
(स्त्री०) जूए की कील,
~मात्रम्
जूए की लंबाई के बराबर माप अर्थात् चार हाथ की लम्बाई,
~वरत्रम्
जूए का फीता या तस्मा ।
परिशिष्ट