योगः [युज् भावादौ घञ्, कुत्वम्]
1. जोड़ना, मिलाना
2. मिलाप, संगम, मिश्रण, –उपरागान्ते शशिनः समुपगता रोहिणी योगम्–श० ७।२२, गुणमहतां महते गुणाय योगः–कि० १०।२५, (वां) योगस्तडित्तोयदयोरिवास्तु –रघु० ६।६५
3. संपर्क स्पर्श, संबंध –तमङ्कमारोप्य शरीरयोगजैः सुखैर्निषिञ्चन्तमिवामृतं त्वचि –रघु० ३।२६
4. काम में लगाना, प्रयोग, इस्तेमाल–एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् –मनु० ९।१०, रघु० १०।८६
5. पद्धति, रीति, क्रम, साधन–कथायोगेन बुध्यते–हि० १, 'बातचीत के क्रम में,
6. फल, परिणाम (अधिकतर समास के अन्त में या अपा० के साथ) –रक्षायोगादयमपि तपः प्रत्यहं संचिनोति–श० २।१४, कु० ७।५५
7. जुआ
8. वाहन, सवारी, गाडी
9. जिरहबख्तर, कवच
10. योग्यता, औचित्य, उपयुक्तता
11. व्यवसाय, कार्य, व्यापार
12. दाव–पेंच, जालसाजी, कूट चाल
13. तरकीब, योजना, उपाय
14. कोशिश उत्साह, परिश्रम, अध्यवसाय–मनु० ७।४४
15. उपचार, चिकित्सा
16. इन्द्रजाल, अभिचार, मंत्रयोग, जादू, जादूटोना
17. लब्धि, अवाप्ति, अभिग्रहण
18. धन दौलत, द्रव्य
19. नियम, विधि
20 पराश्रय, संबंध, नियमित आदेश या संयोग, एक शब्द की दूसरे शब्द पर निर्भरता
21. निर्वचन, या अर्थ की दृष्टि से शब्द व्युत्पत्ति
22. शब्द के निर्वचनमूलक अर्थ (विप० रूढि)
23. गंभीर भावचिन्तन, मन का सकेन्द्रीकरण, परमात्मचिन्तन, जिसे योगदर्शन में 'चित्तवृत्तिनिरोध कहते हैं,–सती सती योगविसृष्टदेहा–कु० १।२१, योगेनान्ते तनुत्यजाम् –रघु० १।८
24. पतंजलि द्वारा स्थापित दर्शन पद्धति जो सांख्य दर्शन का ही दूसरा भाग समझा जाता है, परन्तु व्यवहारतः यह एक पृथक् दर्शन है (योगदर्शन का मुख्य सिद्धांत उन उपायों की शिक्षा देना है जिनके द्वारा मानव आत्मा पूर्ण रूप से परमात्मा में मिल जाय और इस प्रकार मोक्ष की प्राप्ति हो जाय । इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गंभीर भावचिन्तन ही मुख्य साधन बताया गया है, इस प्रकार के योग या मन के संकेन्द्रीकरण के समुचित अभ्यास के लिए विस्तार के साथ नियमों का प्रतिपादन किया गया है)
25. (अंक में) जोड़, संकलन
26. (ज्योति० में) संयुक्ति, दो ग्रहों का योग
27. तारापुंज
28. विशेष प्रकार का ज्योतिषीय समय–विभाग (इस प्रकार के बहुधा २७ योग गिनाये गये हैं)
29. किसी नक्षत्र पुंज का मुख्य तारा
30 भक्ति, परमात्मा की पवित्र खोज
31. भेदिया, गुप्तचर
32. द्रोही, विश्वासघाती ।
समस्त पद
~अंगम्
योग की प्राप्ति के साधन (यह गिनती में आठ हैं, नामों के लिए दे० यम
5.
~आचारः
1. योग का अभ्यास या पालन
2. बुद्ध
2 के उस संप्रदाय का अनुयायी जो केवल विज्ञान या प्रज्ञा के शाश्वत अस्तित्व को ही मानता है,
~आचार्यः,
1. जादू का शिक्षक
2. योग दर्शन का अध्यापक,
~आधमनम्
जालसाजी से भरी बन्धकावस्था–मनु० ८।१६५,
~आरूढ
(वि० (सूक्ष्मभावचिन्तन में निमग्न,
~आसनम्
सूक्ष्मभावचिन्तन के अनुरूप अंग–स्थिति,
~इन्द्रः, ~ईशः, ~ईश्वरः
1. योग में निष्णात या सिद्धहस्त
2. जिसने अलौकिक शक्ति सम्पादन कर ली है
3. जादूगर
4. देवता
5. शिव का विशेषण
6. याज्ञवल्क्य का विशेषण,
~क्षेमः
1. सामान की सुरक्षा, संपत्ति की देखभाल
2. दुर्घटनाओं से संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए शुल्क, बीमा
3. कल्याण, कुशलक्षेम, सुरक्षा समृद्धि–तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्–भग० ९।२२, मुग्धाया मे जनन्या योगक्षेमं वहस्व–मालवि० ४
4. संपत्ति, लाभ, फायदा
(पुं०, नपुं० द्वि०व०, –मौ, –मे, नपुं० ए० व० –मम्)
(संपत्ति का) भिग्रहण और प्ररक्षण, उपलब्धि और सुरक्षा, पुराने का प्ररक्षण तथा नूतन का अभिग्रहण (जो पहले से अप्राप्त हो) अलभ्यलाभो योगः स्यात् क्षेमो लब्धस्य पालनम् –दे० याज्ञ० १।१०० और उस पर मिता०.
~चूर्णम्
जादू का चूर्ण, जादू की शक्ति वाला चूरा,–कल्पितमनेन योगचूर्णमिश्रितमौषधं चन्द्रगुप्ताय–मुद्रा० २.
~तारका, ~तारा
नक्षत्रपुंज का मुख्य तारा,
~दानम्
1. योग के सिद्धांतों का संचारण
2. जालसाजी से युक्त उपहार,
~धारणा
सतत भक्ति, अनवरतभजन
~नाथः
शिव का विशेषण,
~निद्रा
अर्धचिन्तन और अर्धनिद्रित अवस्था, जागरण और निद्रा के मध्य की स्थिति अर्थात् लघुनिद्रा–योगनिद्रां गतस्य मम–पंच० १, हि० ३।७५, भर्तृ० ३।४१
2. युग के अन्त में विष्णु की निद्रा,–रघु० १०।१४.१३।६.
~पट्टम्
भावसमाधि के अवसर पर संन्यासियों द्वारा पहना जाने वाला वस्त्र जो पीठ से लेकर घुटनों तक शरीर को ढक लेता है,
~पतिः
विष्णु का विशेषण,
~बलम्
1. भक्ति की शक्ति, भावचिंतन की शक्ति, अलौकिक शक्ति
2. जादू की शक्ति,
~माया
1. योग की जादू जैसी शक्ति
2. ईश्वर की सर्जन शक्ति जिससे कि देवता के रूप में मूर्त धरा की रचना की जाती है (भगवतः सर्जनार्था शक्तिः)
3. दुर्गा का नाम,
~रङ्गः
नारंगी,
~रूढ
(वि०) वह शब्द जिसके निर्वचनमूलक अर्थ भी हैं, साथ ही उसका विशेष परंपरागत अर्थ है, उदा० 'पंकज' इसका व्युत्पत्तिजन्य अर्थ है 'कीचड़ से उत्पन्न होने वाला कोई भी पदार्थ' परन्तु प्रचलन या परंपरा के प्रयोगानुसार इसका अर्थ 'कीचड़ में उत्पन्न किसी वस्तु – अर्थात् कमल' में प्रतिबद्ध हो जाता है, तु० 'आतपत्र' छतरी,
~रोचना
एक प्रकार का जादू का लेप जिसके लगाने से मनुष्य अदृश्य और अभेद्य हो जाता है – तेन च परितुष्टेन योगरोचना मे दत्ता–मृच्छ० ३,
~वर्तिका
जादू का लैम्प या बत्ती,
~वाहिन्
(पुं०, नपुं०) औषधियों को मिलाने का माध्यम–उदा० शहद –नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु–सुश्रु०,
~वाही
1. रेह, सज्जी
2. मधु
3. पारा,
~विक्रयः
धोखे की बिक्री,
~विद्
(वि०) योग का जानकार (पुं०)
1. शिव का विशेषण
2. योगाभ्यासी
3. योगसिद्धांतों का अनुयायी
4. जादूगर
5. दवाइयों के बनाने वाला,
~विभागः
बहुधा एक स्थान पर जुड़े हुओं को अलग–अलग करना, विशेषतः सूत्र के शब्दों को अलग अलग करना, एक ही नियम के दो तीन टुकड़े करना (महाभाष्य में पतंजलि ने इसका बहुत प्रयोग किया है–उदा० अदसो मात् पा० १।१।१२),
~शास्त्रम्
योगदर्शन,
~समाधिः
आत्मा का गूढ़ भावचिन्तन में लीन होना–तमसः परमापदव्ययं पुरुषं योगसमाधिना रघु: –रघु० ८।२४, योगविधि ८।२२,
~सारः
सब रोगों की एक दवा, रामबाण, सर्वव्याधिहर,
~सेवा
भावचिंतन का अभ्यास करना ।
योगः [युज्+घञ् कुत्वम्]
1. आक्रमण –योगमाज्ञापयामास शिवस्य विषयं प्रति –शिव० १३।७,
2. सतत संसक्ति, लगातार मिलाना–मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी–भग० १३।१०
3. समता साम्य–समत्वं योग उच्यते–भग० २।४०
4. दुःख के 'जों से छुटकारा–दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् –भग०
5. मिलाना, जोड़ना
6. संपर्क
7. उपयोग
8. परिणाम
9. जूआ ।
समस्त पद
~अभ्यासिन्
(वि०) जो योग का अभ्यास करता है,
~आख्या
केवल आकस्मिक संपर्क के कारण व्युत्पन्न नाम–एषा योगाख्या योगमात्रापेक्षा न भूतवर्तमानभविष्यत्संबन्धापेक्षा मी० सू० १।३।२१ पर शा० भा०
~आपत्तिः
प्रचलन में परिवर्तन,
~क्षेमः
1. समृद्धि, सुरक्षा
2. कल्याण, भलाई
3. धार्मिक कार्यों के निमित्त कल्पित संपत्ति–मनु० ९।२१९,
~दण्डः
योग की शक्ति से युक्त छड़ी जादू की छडी,
~नाविकः, ~नाविक
एक प्रकार की मछली,
~पदम्
स्वसंकेन्द्रण की स्थिति,
~पानम्
मूर्छा लाने वाले पदार्थों से युक्त शराब, पीनक,
~पीठम्
योग का अभ्यास करते समय बैठने की विशेष मुद्रा,
~पुरुषः
गुप्तचर,–यथा योगपुरुषैरन्यान् राजाधितिष्ठति–कौ० अ० १।२१,
~भ्रष्ट
(वि०) जो योग के मार्ग से पतित हो गया है–शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते–भग०,
~यात्रा
परमेश्वर से सायुज्य प्राप्त करने का मार्ग.
~युक्त
(वि०) योगमार्ग में संलग्न–योगयुक्तो भवार्जुन– भग० ८।२७,
~वामनम्
गुप्त उपाय,कूटयुक्ति, कपटयोजना, कौ० अ०,
~वाहक
( वि० ) विघटनकारी (रसायन०),
~विद्या
योगशास्त्र,
~संसिद्धिः
योगाभ्यास में पूर्णसाफल्य प्राप्त करना,
~सिद्धिन्यायः
एक न्याय जिसके अनुसार नाना प्रकार के फलों को देने वाली एक विशिष्ट प्रक्रिया एक समय में केवल एक ही फल दे सकती है, दूसरा फल प्राप्त करने के लिए उस प्रक्रिया का पृथक् रूप से दूसरा प्रयोग करना पड़ेगा मी० सू० ४।३।२७–२८ पर शा० भा० ।
परिशिष्ट