रसः [रस्+अच्]
1. सार, (वृक्षों का) दूध, रस, इक्षुरसः कुसुमरस: आदि
2. तरल, द्रव –कु० १।७
3. पानी –सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रवि: –रघु० १।१९ भामि० २।१४४
4. मदिरा, शराब –मनु० २।१७७,
5. घूंट एक मात्रा, खूराक
6. चखना, रस, स्वाद (आलं० से भी) (वैशेषिक दर्शन के २४ गुणों, में से एक; रस छः है:–कटु, अम्ल, मधुर, लवण, तिक्त और कषाय) –परायत्तः प्रीतेः कथमिव रसं वेत्तु पुरुषः–मुद्रा० ३।४, उत्तर० २।२
7. चटनी, मिर्च मसाला ८. कोई स्वादिष्ट पदार्थ –रघु० ३।४ ९. किसी वस्तु के लिए स्वाद या रुचि, पसन्दगी, इच्छा –इष्टे वस्तुन्यपचितरसा: प्रेमराशीभवन्ति –मेघ० ११२
10. प्रेम, स्नेह, –जरसा यस्मिन्नहार्यो रस:–उत्तर० १।३९, प्रसरति रसो निर्वृतिघनः ६।११, 'प्रेम की अनुभूति'–कु० ३।३७
11. आनन्द, प्रसन्नता, खुशी–रघु० ३।२६
12. लावण्य, अभिरुचि, सौन्दर्य, लावण्य
13. करुणरस, भाव–भावना
14. (काव्य रचनाओं में) रस –नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति –काव्य० १, (रस प्रायः आठ हैं:–
“शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः ।
बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसा स्मृता: ॥”
परन्तु कभी कभी 'शांत' रस को जोड़ कर नौ रस बना दिये जाते हैं, –निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः – काव्य० ४; कभी कभी दसवां रस 'वात्सल्य' और मिला दिया जाता है । प्रत्येक काव्यरचना के रस आवश्यक घटक हैं, परन्तु विश्वनाथ के मतानुसार 'रस' काव्य की आत्मा है–वाक्यं रसात्मकं काव्यम् –सा० द० ३)
15. सत्, सार, तत्त्व, सर्वोत्तम भाग
16. शरीर के संघटक द्रव
17. वीर्य
18. पारा
19. विष, जहरीला पेय, जैसा कि 'तीक्ष्णरसदायिनः' में
20. कोई भी खनिज या धातुसंबंधी लवण ।
समस्त पद
~अञ्जनम्
रसौत, एक प्रकार का अंजन,
~अम्ल:
अमलबेत,
~अयनम्
1. अमृत, कोई भी औषध जो बुढ़ापे को रोक कर जीवन को लम्बा करे, –निखिलरसायनमहितो गन्धेनोग्रेण लशुन इव –रस०
2. (आलं०) अमृत का काम देने वाला अर्थात् जो मन को तृप्त भी करे साथ ही हर्षित भी करे, –आनन्दनानि हृदयैकरसायनानि –मा० ६।८, मनसश्च रसायनानि –उत्तर० १।३६, श्रोत्रं कर्ण° आदि
3. रससिद्धि, रसायन
°श्रेष्ठः
पारा.
~आत्मक
(वि०)
1. रसीला, रसदार
2. तरल, द्रव,
~आभासः
किसी रस का बाह्यरूप या केवल प्रतीति
2. किसी रस का अनुपयुक्त स्थान पर वर्णन,
~आस्वादः
1. सत् या रस आदि चखना
2. काव्यरस की अनुभूति, काव्य सौन्दर्य का प्रत्यक्षीकरण –जैसा कि 'काव्यामृतरसास्वादः' में,
~इन्द्रः
1. पारा
2. पारसमणि, चिन्तामणि (कहते हैं कि इसके स्पर्श से लोहा, सोना बन जाता है),
~उद्भवम्, ~उपलम्
मोती,
~कर्मन्
(नपुं०) उन वस्तुओं को तैयार करना जिनमें पारा इस्तेमाल किया जाता है,
~केसरम्
कपूर,
~गन्धः, –धम्
लोबान की तरह का खुशबूदार गोंद, रसगन्ध,
~ग्रह
(वि०)
1. रसों का ज्ञाता
2. आनन्द मनाने वाला,
~जः
राब, शीरा,
~जम्
रुधिर,
~ज्ञ
(वि०)
1. जो रस की उत्तमता को परखता है, जो स्वाद जानता है, –सांसारिकेषु च सुखेषु वयं रसज्ञाः –उत्तर० २।२७
2. वस्तुओं के सौन्दर्य को पहचानने में सक्षम
(–ज्ञः)
1. स्वाद का जानकार. भावुक, विवेचक, काव्यमर्मज्ञ, कवि
2. रससिद्धि का ज्ञाता
3. पारे के योग से बनने वाली औषधियों के तैयार करने वाला वैद्य,
(–ज्ञा)
जिह्वा,–भामि० २।५९,
~तेजस्
(नपुं०) रुधिर
~दः
वैद्य,
~धातु
(नपुं०) पारा,
~प्रबन्धः
कोई भी काव्यरचना, विशेष कर नाटक,
~फलः
नारियल का पेड़,
~भङ्गः
रस का टूट जाना या अवरोध,
~भवम्
रुधिर,
~राजः
पारा,
~विक्रयः
मदिरा की बिक्री,
~शास्त्र
रससिद्धि का विज्ञान,
~सिद्ध
(वि० )
1. काव्य–सम्पन्न, रसवेत्ता–जयन्ति ते सुकृतिनः रससिद्धाः कवीश्वराः–भर्तृ० २।२४
2. रससिद्धि मे कुशल,
~सिद्धिः
(स्त्री०) रससिद्धि में कुशलता ।
रसः [रस्+अच्]
1. (वृक्षों का) रस
2. तरल पदार्थ
3. सुरा, पेय
4. घूंट, (दवा की) मात्रा
5. स्वाद, रस
6. प्रेम
7. प्रेम, अनुराग
8. हर्ष, आमोद
9.(साहित्यिक) रस
10. सत, अर्क
11. वीर्य
12. पारा
13. विष
14. गन्ने का रस
15. पिघला हुआ मक्खन
16. अमृत
17. रसा (शाक भाजी का)
18. हरा प्याज
19. सोना
20. छ: की संख्या का प्रतीक
21 रसग्रहण करने का अंग जिह्वा – भाग० ८।२०।२७
22. पिघली हुई धातु ।
समस्त पद
~इक्षुः
गन्ना,
~उत्पत्तिः
(अलं०)
1. रस की निष्पत्ति
2. संजीवन रस की उपज,
~घन
(वि०) रस से भरा हुआ,
~ज्ञानम्
भैषज्यविज्ञान,
~तन्मात्रम्
रस या स्वाद का सूक्ष्म तत्त्व,
~निवृत्तिः
स्वाद का न होना, रसहीनता,
~भेदः
पारे का निर्माण ।
परिशिष्ट