राहुः [रह् +उण्]
एक राक्षस का नाम, विप्रचित्त और सिंहिका का पुत्र, इसीलिए कई बार यह सैंहिकेय कहलाता है (जब समुद्रमंथन के परिणाम स्वरूप समुद्र से निकला अमृत देवताओं को परोसा जाने लगा तो राहु ने वेश बदलकर उनके साथ स्वयं भी अमृत पीना चाहा । परन्तु सूर्य और चन्द्रमा को इस षड्यन्त्र का पता लगा तो उन्होंने विष्णु को इस चालाकी का ज्ञान कराया । फलतः विष्णु ने राहु का सिर काट डाला, परन्तु चूंकि थोड़ा सा अमृत वह चख चुका था, तो उसका सिर अमर हो गया । परन्तु कहते हैं कि पूर्णिमा या अमावस्या को वे दोनों चन्द्र और सूर्य को अब भी सताते रहते हैं–तु० भर्तृ० २।३४ । ज्योतिष में राहु भी केतु की भांति समझा जाता है, यह आठवाँ ग्रह है, या चन्द्रमा का आरोही शिरोबिन्दु है)
2. ग्रहण, या ग्रस्त होने का क्षण ।
समस्त पद
~ग्रसनम्, ~ग्रासः, ~दर्शनम्, ~संस्पर्शः
(चाँद या सूर्य का) ग्रहण,
~सूतकम्
राहु का जन्म अर्थात् (चाँद या सूर्य का), ग्रहण –याज्ञ० १।१४६ तु० मनु० ४।११० ।