संस्कृत-शब्दकोशः

विप्रलब्ध विप्रलम्भित

विप्रलम्भ

विप्रलम्भः [वि+प्र+लम्भ्+घञ्]


1. धोखा, छल, चालाकी –कि० ११.२७
2. विशेषकर मिथ्या उक्तियों या झूठी प्रतिज्ञाओं से छलना
3. कलह, असहमति
4. अनैक्य, पार्थक्य, अलगाव
5. प्रेमियों का बिछोह –शुश्रुवे प्रियजनस्य कातरं विप्रलम्भपरिशंकिनो वचः रघु० १९।१८, वेणी० २।१२
6. (अलं० में) विप्रलम्भ शृंगार (इसमें नायक नायिका के विरहजन्य सन्ताप आदि का वर्णन किया जाता है) शृंगार के दो मुख्य भेदों में से एक, (विप० संभोग) – अपरः (विप्रलम्भः) अभिलाष विरहेर्ष्या प्रवासशापहेतुक इति पंचविधः–काव्य० ४,
“यूनोरयुक्तयोर्भावो युक्तयोर्वाथवा मिथः ।
अभीष्टालिङ्गनादीनामनवाप्तौ प्रहृष्यते ॥”
विप्रलम्भः स विज्ञेयः–उज्ज्वलनीलमणिः, तु० सा० द० २१२, तथा आगे ।



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