विमर्षः [वि+मृष्+घञ्]
1. विचार, विचारविनिमय
2. अधीरता, असहिष्णुता
3. असन्तोष, अप्रसन्नता
4. (नाटकों में ) नाटकीय कथा वस्तु की सफल प्रगति में परिवर्तन, किसी प्रेमाख्यान के सफल प्रक्रम में किसी अदृष्ट दुर्घटना के कारण परिवर्तन, सा०६० ३३६ पर इसकी परिभाषा यह है–
“यत्र मुख्यफलोपाय उद्भिन्नो गर्भतोऽधिकः ।
शापाद्यैः सांतरायश्च स विमर्ष इति स्मृतः ॥”
दे० मुद्रा० ४।३, (इन सब अर्थों के लिए बहुधा विमर्श लिखा जाता है) ।